मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
वहाबियत से पनपा आतंकवाद !
सुन्नी मुसलमान
सुन्नी या सुन्नत का अर्थ है पैग़म्बर मोहम्मद साहब (570-632 ईसवी) द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करना।
दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं।
सुन्नी मुसलमानों का मत है कि पैग़म्बर मोहम्मद ने अपने ससुर हज़रत अबु-बकर (632-634 ईसवी) को अपना उत्तराधिकारी बनाया था जिन्हें ख़लीफ़ा कहा गया है। अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी), हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और हज़रत अली (656-661 ईसवी) को सुन्नी मुसलमानों ने अपना नेता माना।
यह चार खलीफा ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन अर्थातन सही मार्ग का अनुसरण करने वाले माने गए। इनके बाद के खलीफा केवल राजनीतिक दृष्टि से ही महत्व रखते है उनका धार्मिक महत्व समाप्त हो गया।
इस्लामिक क़ानून (शरीयत) की व्याख्या करने के आधार पर सुन्नी मुसलमान पांच पंथों में बंटे है जिनमे आपसी विभेद है।
इन पांचों सुन्नी समुदायों में हर एक का दावा है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने ही इस्लाम की सही व्याख्या की है।
दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख मत हैं।
आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए. उन्होंने इस्लामिक क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के समर्थक बन गए.
ये चार इमाम थे- इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी), इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी), इमाम हंबल (780-855 ईसवी) और इमाम मालिक (711-795 ईसवी).
हनफ़ी
------------
इमाम अबू हनीफ़ा के समर्थक हनफ़ी कहलाते हैं। इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून को मानने वाले मुसलमान भी दो अलग अलग फिरकों देवबंदी एवं बरेलवी में विभाजित हैं जो एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते है।
20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (देवबन्द मदरसा) (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां (बरेली मदरसा) (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की जिसके आधार पर इनके समर्थक देवबंदी और बरेलवी धड़ों में विभाजित हैं।
देवबंदी
-------------
मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम नानोतवी ने 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना की थी। देवबंदी विचारधारा के विकास में मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही, मौलाना क़ासिम नानोतवी और मौलाना अशरफ़ अली थानवी का बड़ा योगदान है।
भारतीय उपमहाद्वीप अर्थात भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो: देवबंदी एवं बरेलवी, पंथों से है
देवबंदी और बरेलवी दोनों विचारधाराओं का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है जिसके अनुपालन के लिए इमाम का अनुसरण ज़रूरी है। इसलिए शरीयत के समस्त क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं।
बरेलवी
-------------
वहीं बरेलवी मुसलमान आला हज़रत रज़ा ख़ान बरेलवी के मार्ग का अनुसरण करते हैं। बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो बरेलवी मुसलमानों का सबसे बड़ा केंद्र है।
दोनों में पंथों में कई मतभेद हैं। जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सर्वदर्शी,सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं।वह सब कुछ देख रहे हैं।अर्थात बरेलवी मुहम्मद साहब को ही सब कुछ मानते हैं।अर्थात मुहम्मद ही उनके अल्लाह है।
इसके विपरीत देवबंदी मुहम्मद साहब को इंसान मानते हैं जो केवल अल्लाह के भेजे गए नबी थे उंन्हे अल्लाह के बाद स्थान पर रखते हैं।
बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदी मुसलमान मजार पूजा गैर-इस्लामी मानते है
मालिकी
इमाम अबू हनीफ़ा के बाद सुन्नियों के दूसरे इमाम, इमाम मलिकी हैं।एशिया में इनकी संख्या काफी कम है।मलिकी ने 'इमाममोत्ता' नामक पुस्तक में शरीयत की व्याख्या की है।
उसके समर्थक मलिकी के बनाये नियमों का पालन करते हैं। ये समुदाय मुख्यतः मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में पाए जाते हैं।
शाफ़ई
शाफ़ई इमाम मालिक का शिष्य था जो सुन्नियों का तीसरा प्रमुख इमाम हैं।उनके अनुयायी काफी बड़ी संख्या में हैं जो ज़्यादातर मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों में रहते हैं।
इस्लामी तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी फ़िक़ह से काफी अलग है। उसके अनुयायी भी इस बात में विश्वास रखते हैं कि इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है।
हंबली
सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मध्य पूर्व और कई अफ्रीकी देशों के मुसलमान मुख्यतः इमाम हंबल के फ़िक़ह का अनुसरण करते हैं और अपने आपको हंबली कहते हैं।
सऊदी अरब की सरकारी शरीयत इमाम हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर आधारित है।
उसके अनुयायियों का कहना है कि उसका बताया हुआ तरीक़ा हदीसों के अधिक करीब है।
इन चारों इमामों को मानने वाले मुसलमानों का मत है कि शरीयत का पालन करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है।
सल्फ़ी, वहाबी और अहले हदीस
सल्फी, अहले हदीस अथवा वहाबी के नाम से प्रसिद्द एक पांचवा सुन्नी धड़ा है जो इमामियत पर यकीन नही करता है उसका कहना है कि शरीयत को समझने और उसका सही ढंग से पालन करने के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए।
यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान, उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य का तो सम्मान करता है लेकिन उसका मत है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण अनिवार्य नहीं है।किसी भी विवादास्पद विषय मे ईमाम के बजाय अंतिम फ़ैसला क़ुरान और हदीस का ही होना चाहिए।
सल्फ़ी(वहाबी) उस इस्लाम को मानता है जो उसके अनुसार पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था। सल्फ़ियत का विस्तार करने का श्रेय इब्ने तैमिया(1263-1328) और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब(1703-1792) को है और अब्दुल वहाब के नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है। मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावित हैं। वहाबी पंथ बेहद कट्टर और आतंकी विचारधारा का पौषक है। सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं।अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी सल्फ़ी विचाराधारा का ही समर्थक था।
सुन्नी बोहरा
यह वर्ग गुजरात, महाराष्ट्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत का मुस्लिम व्यापारी समुदाय है । बोहरा, शिया और सुन्नी दोनों में पाए जाते हैं।
सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक क़ानून को मानते है जबकि सांस्कृतिक तौर पर यह दाऊदी बोहरा यानी शिया समुदाय के क़रीब हैं.
अहमदिया
हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय अपने आप को अहमदिया कहता है। इस समुदाय की स्थापना भारतीय पंजाब के क़ादियान में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी। अहमद के अनुयायियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ख़ुद नबी का ही एक अवतार थे
उनके अनुसार वे खुद कोई नई शरीयत तो नहीं लाए और पैग़म्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे हैं लेकिन गुलाम अहमद भी पैगम्बर ही हैं। मुसलमानों के लगभग सभी संप्रदाय इस बात पर सहमत हैं कि मोहम्मद साहब ही अंतिम पैगम्बर थे लेकिन अहमदियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ऐसे धर्म सुधारक थे जो नबी का दर्जा रखते हैं।
बस इसी बात पर मतभेद इतने गंभीर हैं कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अहमदियों को मुसलमान ही नहीं मानता। यद्यपि भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में अहमदियों की अच्छी ख़ासी संख्या है।
पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर अहमदियों को इस्लाम से बेदखल कर दिया गया है।अहमदिया आन्दोलन की स्थापना वर्ष 1889 ई. में 'कादियान' (गुरदासपुर) नामक स्थान पर मिर्ज़ा गुलाम अहमद (1838-1908) द्वारा 19वीं सदी में की गई थी।
इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में इस्लाम धर्म के सच्चे स्वरूप को बहाल करना एवं मुस्लिमों में आधुनिक औद्योगिक और तकनीकी प्रगति को धार्मिक मान्यता देना था। मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने स्वयं को श्रीकृष्ण का अवतार भी मानना शुरू कर दिया था। इन्हीं कारणों से इस आन्दोलन को शास्त्र के प्रतिकूल एवं दिगभ्रमित माना गया। मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने अपनी पुस्तक ‘बराहीन-ए-अहमदिया’ में अपने सिद्धान्तों की व्याख्या की है।
शनिवार, 7 अक्टूबर 2017
बलूचिस्तान:इतिहास एवं वर्तमान
बलूचिस्तान:इतिहास एवं वर्तमान
@ सुनील सत्यम
बलूचिस्तान का इतिहास पाकिस्तान के इतिहास से कई हजार वर्ष पुराना है।उतना ही पुराना है ब्लूचिस्तान जितना की स्वयं भारत। विदित है कि कभी अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पाकिस्तान और शेष भारत, भौगोलिक रूप से एक ही देश,भारत का अंग थे। बलूचिस्तान भी आर्यावर्त का एक हिस्सा है। सप्त सैंधव क्षेत्र का विस्तार प्राचीन काल में वैदिक युग में पर्शिया से लेकर गंगा, और पूर्व में सोन एवं पुनपुन के पर तक था जिसमें सिंधु घाटी का क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण था। वैदिक साहित्य में बार बार सप्तसैंधव प्रदेश की चर्चा आई है,जो आर्यों द्वारा अधिवासित प्रमुख भौगोलिक क्षेत्र था।
ऐसा माना जाता है कि बलूच, पख्तून,अफगान, पंजाबी, कश्मीरी आदि पश्चिम भारत के लोग पुरु वंश से संबंध रखते हैं ।यही वंश आगे चलकर कुरु वंश के साथ सम्मिलित हो गया और ये सम्मिलित रूप से कौरव कहलाए। भारत का ज्ञात इतिहास पौराणिक रूप से लाखों वर्ष प्राचीन है लेकिन पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक साक्ष्य भी इसे दस हजार वर्ष से प्राचीन मानते हैं।ब्लोचों का भी मत हैं कि उनके इतिहास की शुरुआत 9 हजार ई.पू. हुई थी।
बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे महत्वपूर्ण 51 शक्तिपीठों में से एक हिंगलाज माता शक्तिपीठ स्थित है,जिसका वर्णन दुर्गाशप्तशती के अंतर्गत श्री दुर्गा चालीसा में भी किया गया है-"हिंगलाज में तुम्ही भवानी,महिमा अमित न जात बखानी"।
हिंगलाज माता मंदिर, पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में सिंध राज्य की राजधानी कराची से 120 कि॰मी॰ उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट पर ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित है। यह इक्यावन शक्तिपीठ में से एक माना जाता है और कहते हैं कि यहां सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था।
बलूचिस्तान में भगवान बुद्ध की अनेक मूर्तियां पाई गईं। कभी यह सम्पूर्ण क्षेत्र में बौद्ध धर्म के व्यापक प्रभाव के अंतर्गत था लेकिन इस्लाम के आगमन ने बौद्धों को पलायन के लिए मजबूर कर दिया अथवा उनका वृहद रूप में धर्मांतरण किया गया।
देश के प्राचीन 16 महाजनपदों में गांधार अफगानिस्तान में स्थित था जिसके अंतर्गत ही बलोचिस्तान भी अवस्थित था। बाद में इस क्षेत्र पर चन्द्रगुप्त मौर्य अधिकार रहा। महाभारत में भी लगभग 200 जनपदों का वर्णन मिलता है जिनमें खांडव, सौवीर सौराष्ट्र, कुरु, पांचाल, कौशल, शूरसेन, किरात, निषाद, मत्स, चेदि, उशीनर, वत्स, कौशाम्बी, विदेही, अंग, प्राग्ज्योतिष (असम) ,दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कम्बोज, गांधार, कैकय, वाल्हीक बलख, अभिसार (राजौरी), कश्मीर, मद्र, यदु, तृसु, घंग, मालवा, अश्मक, कलिंग, कर्णाटक, द्रविड़, चोल, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, आंध्र तथा सिंहल आदि प्रमुख हैं। इनमें से लगभग 30 के द्वारा महाभारत के युद्ध में भाग लेने का वर्णन मिलता है।
बालाकोट,ब्लूचिस्तान में स्थित प्रमुख हड़प्पाई क्षेत्र है। यह नालाकोट से लगभग 90 किमी की दूरी पर बलूचिस्तान के दक्षिणी तटवर्ती क्षेत्र में स्थित था। बालाकोट से हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पा कालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण मेहरगढ़ का स्थान बलूचिस्तान के कच्ची मैदानी के क्षेत्र में है। मेहरगढ़ की संस्कृति और सभ्यता को 7 हजार ईसापूर्व से 2500 ईसापूर्व एक पूर्व-हड़प्पाई अधिवास था जहां से कृषि एवं पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं जिन्हें ई.पू. 6000 से प्राचीन बताया जाता है(फ्रांसीसी पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर जैरिग)
मेहरगढ़ आज के बलूचिस्तान में बोलन नदी के किनारे स्थित है। ब्लूचिस्तान से कई पुरापाषाण कालीन बस्तियां भी प्रकाश में आई हैं।
बलूचिस्तान, विश्व मानचित्र पर 30 .07 डिग्री उत्तर तथा 67.01 डिग्री पूर्व अक्षांशों के बीच अवस्थित है। इस देश का (जिस पर पाकिस्तान का अनधिकृत कब्जा है.) सबसे बड़ा और राजधानी नगर क्वेटा है। आजकल, पाकिस्तान द्वारा इसके नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है। विश्व की महान हड़प्पा सभयता के आरंभिक बीज बलूचिस्तान के प्रसिद्ध मकरान तट तथा इसके पूर्वी क्षेत्र में ही पनपे थे। रहमान ढेरी तथा मेहरगढ़ इस क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता के प्रतिनिधि स्थल है।
ईरानी व अफगानी बलोच क्षेत्र को छोड़ दें तो पाकिस्तान अधिकृत बलूचिस्तान 4 रियासतों से मिलकर बना है। कलात,लासबेला, खरण तथा मकरान, यह 4 भारतीय देशी रियासतें ( Princely States) थी जिनका बाद में सिर्फ एक कलात में विलय हो गया। 1947 के भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम ने भारत का विभाजन भारत और पाकिस्तान नाम के दो अधिगणराज्यों के रूप में कर दिया, लेकिन देशी रियासतों के बारे में कोई निर्णय नहीं किया गया। यह देशी राज्यों के ऊपर छोड़ दिया गया कि उन्हें भारत में शामिल होना है या पाकिस्तान में अथवा स्वतंत्र रहना है। कलात के खान पर जिन्नाह ने दबाव डालना शुरू किया कि वह पाकिस्तान में शामिल होना स्वीकार करे। लेकिन खान ने जिन्नाह को कहा कि "वह अपनी परिषद के निर्णय से उन्हे अवगत करा देंगे, उन्हे पाकिस्तान में शामिल होने अथवा न होने पर पर विचार करने के लिए समय दिया जाए। " लेकिन खान के किसी जबाब की प्रतीक्षा किए बिना जिन्नाह ने 26 मार्च 1948 को पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान पर आक्रमण करने का आदेश दे दिया। पाकिस्तान द्वारा 1 अप्रैल 1948 को कलात पर बलात कब्जा कर लिया गया । कलात के खान ने कभी भी "विलय पत्र" पर हस्ताक्षर नहीं किए।
असल में भारत में वहाबी विचारों से प्रभावित तत्कालीन ढाका के नाबाब सलीमुल्लाह और नाबाब आगा खान जैसे लोगों ने धर्म के आधार पर पाकिस्तान के विचार की नींव रखी जिसका प्रारम्भ में तो भारतीय मुस्लिम मानस ने समर्थन नहीं किया। लेकिन जैसे जैसे धर्म के आधार पर विभाजन की मांग ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया अधिकाधिक संख्या में मुस्लिम पाकिस्तान के विचार की और आकर्षित होते चले गए। शिया खोजा पंथ से संबंध रखने वाले जिन्ना ने अपने राजनीतिक पुनर्वास के लिए पाकिस्तान के विचार का अधिग्रहण कर लिया और 1947 आते आते उसने भारत में स्वयं को मुसलमानों के सबसे बड़े नेता के रूप में स्थापित कर लिया।
भारत का विभाजन आनन फानन में धर्म के आधार पर कर दिया गया था लेकिन पाकिस्तान एक कृत्रिम देश के रूप में दुनिया में अस्तित्व में आया । पाकिस्तान असल में तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय नेतृत्व की असफलता और कुछ समृद्ध मुस्लिम जातियों और मुस्लिम घरानों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की परिणति मात्र था। इसके अंदर अवस्थित पख्तून, बलोच और सिंधी कौमे पाकिस्तान निर्माण के पक्ष में कभी नहीं थी। भारत के सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने कभी भी भारत विभाजन का समर्थन नहीं किया। विभाजन के बाद उन्होने गांधी जी पर विश्वास घात का आरोप लगाते हुए कहा था कि "गांधी जी ने हमें खूंखार भेड़ियों के आगे फेंक दिया है"
बलोच, सिंधी तथा पख्तूनों ने कभी भी खुद को पाकिस्तानी नहीं माना और वह 1947 से लेकर आज 70 वर्षों बाद भी अपनी-अपनी आज़ादी के लिए संघर्षरत हैं।
अपनी कौम की आज़ादी के लिए बलोच लोग लगातार संघर्षरत है। पाकिस्तानी फौज बलोच लोगों पर बेहिसाब जुल्म ढा रही है। 20 हजार से अधिक बलोच महिला एवं पुरुष गायब कर दिये गए जिन्हें मारकर समूहिक कब्रों में दफन कर दिया गया। पाकिस्तान की बलोचों पर ज़्यादतियाँ हिटलर की तानाशाहीपूर्ण दस्तानों को भी कम करार देती है।
पाकिस्तान के कुल भू भाग का 44% हिस्सा बलोचिस्तान के अंतर्गत आता है। लेकिन इसकी कुल जनसंख्या पाकिस्तानी जनसंख्या के 5% से भी कम है । बलूचिस्तान पेट्रोलियम,गैस, लोहा, तांबा,यूरेनियम , सोना चाँदी जैसे खनिजों में अत्यधिक समृद्ध है। इसकी समस्त खनिज संपदा पाकिस्तान द्वारा हड़प ली जाती है। इस प्रकार बलोचिस्तान के लोग एक अमीर क्षेत्र के गरीब लोग है। 1947 में भारत की आज़ादी के समय कलात के खाँ द्वारा भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समक्ष पश्चिम भारत के रूप में विलय का प्रस्ताव रखा था जिसे उन्होने अव्यवहारिक कहकर अस्वीकार कर दिया था।
जिन्नाह के आदेश पर तत्कालीन पाकिस्तानी मेजर जनरल अकबर खान ने 27 मार्च 1948 को कळात के खान को गिरफ्तार करके ब्लूचिस्तान पर बलात कब्जा कर लिया था। तब से लगातार बलोच अपने राष्ट्र की आज़ादी के लिए संघर्षरत हैं। तब से हुए 5 प्रमुख विद्रोह में हजारों बलूच देशभक्त पाकिस्तानी फौज की बर्बरता का शिकार होकर अपने देश के लिए बलिदान हो गए।
(लेखक राज्य जीएसटी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर हैं।प्रस्तुत लेख में लेखक की निजिराय व्यक्त की गई है )
शनिवार, 30 सितंबर 2017
आदिमानव: अफ्रीका से भारत एवं एशिया में प्रसार
* प्राथमिक यानी पेलियोजोइक
* द्वितीयक अर्थात मेसोजोइक
* तृतीय एवं चतुर्थ
इनमें से तृतीयक तथा चतुर्थक, नूतनजीव अवस्था (सिनोजोइक) का निर्माण करते हैं। यह लगभग 8 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ।
सिनोजोइक अर्थात नूतन जीव महाकल्प 7 युगों में विभाजित किया जाता है। जिनमें से बाद के दो अत्यंतनूतन(प्लीस्टोसीन) तथा नूतनतम (होलोसीन) मानव विकास की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अत्यंत नूतन लगभग 30 लाख वर्ष पूर्व तथा नूतनतम(होलोसीन) (आधुनिक युग जिसमें हम रहते हैं) आज से लगभग 10,000 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ माना जाता है।
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति करोड़ों वर्षों तक पौधों और पशुओं तक सीमित रही। पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति प्लीस्टोसीन काल में हुई। लगभग 3.5 से 2 करोड़ वर्ष पूर्व छोटे कद का एक कपि समूह उष्ण कटिबंध के घने जंगलों से बाहर निकला। पहले यह वृक्षों पर ही रहता था। संभवत कपि समूह के जंगल से बाहर निकलने के पीछे जंगल में उनकी जनसंख्या वृद्धि तथा उनके मध्य आपसी संघर्ष एक कारण रहा हो। जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों का क्षेत्रफल भी कम हो रहा था। अतः जलवायु परिवर्तन भी कपि समूह के जंगल से निष्क्रमण का एक उचित कारण हो सकता है।
* हाथों की चालन क्रिया से मुक्ति
* पैरों पर खड़े हो कर, झुक कर चलना
* हाथों की मुक्ति के कारण मस्तिष्क को हाथ की सहायता प्राप्त हुई, जिसने तकनीकी विकास का मार्ग प्रशस्त किया। अब वह हाथों से तकनीकी क्रिया जैसे उपकरण प्रयोग, फल तोड़ना, भोजन करना आदि कार्य करने लगा। यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसने क्रमशः आधुनिक विकसित सभ्यता की नींव रख दी। जंगल से बाहर निकलकर मैदानों में घूमने वाला समूह आस्ट्रेलोपिथेकस कहलाया, जो पूर्व-अत्यंतनूतन युग में अस्तित्व में आया था। आस्ट्रेलोपिथेकस का शाब्दिक अर्थ है दक्षिण वानर। इसका उद्भव मानव इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसमें मनुष्य एवं वानर दोनों के लक्षण उपस्थित थे। इसके मस्तिष्क का औसत आकार 450 घन सेंटीमीटर था तथा लंबाई 40 से 50 इंच तक थी। यह मुड़ी हुई पीठ के साथ सीधा चलता था। इसकी खोपड़ी बहुत कुछ मानव समान थी परंतु चेहरा थूथनदार था। इसका उद्भव लगभग 5500000 वर्ष पूर्व से लेकर 1500000 वर्ष पूर्व हुआ था। यह दो पैरों से चलने वाला तथा उभरे पेट वाला था। यह सबसे अंतिम होमिनिड अर्थात पूर्व मानव था। 20 से 15 लाख वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका में होमोहैबिलस अर्थात हाथ वाला मानव (कारीगर मानव) अस्तित्व में आया।
इसे प्रथम मानव की कहते हैं।सर्वप्रथम इसी ने पत्थरों को टुकड़ों में तोड़ कर, टकराकर उनका औजार के रूप में प्रयोग किया। यही प्रथम वास्तविक मानव था। इसकी मस्तिष्क क्षमता 500 से 700 घन सेंटीमीटर थी।
पिथेकोन्थरेपस अर्थात होमो इरेक्टस का अर्थ है सीधा चलने वाला कपि मानव। उनकी दृष्टि क्षमता अत्यंत तीव्र होती थी। मस्तिष्क क्षमता 770 घन सेंटीमीटर से 1300 घन सेंटीमीटर थी। यह सीधा खड़ा हो कर चलता था। इसने अत्यंत लंबी दूरी की यात्राएं की। यह अफ्रिका के उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों से लेकर चीन की समशीतोष्ण क्षेत्रों तक पाया जाता था। यह प्रजाति 1500000 वर्ष पूर्व से लेकर 75000 वर्ष के बीच अस्तित्व मे थी। पत्थर के हस्तकुठार
(हैंडएक्स) के निर्माण तथा अग्नि के आविष्कार का श्रेय होमो इरेक्टस को ही है। मानव पूर्वजों में निएंडरथल प्रथम प्राणी था जिसने हिमाच्छादित क्षेत्रों पर भी विजय पाई और वह समशीतोष्ण क्षेत्रों में दूर-दूर तक पहुंच गया। इसकी मस्तिष्क क्षमता आधुनिक मानव के लगभग समान थी। यह गर्दन झुका कर सीधा चलता था। आधुनिक प्रज्ञ मानव का विकास होमो सेपियंस से हुआ। जिसकी जर्मनी में प्राप्त निअंडरथल से पर्याप्त समानताएं हैं। इसका काल 230000 से 30000 वर्ष पूर्व निर्धारित किया जाता है। आंतरिक विसमांगता के आधार पर इस काल में तीन बड़ी बड़ी मानव प्रजातियों का पूर्व संकेत प्राप्त होता है। यह है काकेशशि, मंगोलॉयड एवं नीग्रोयड।
विश्वभर में प्राचीन काल के पत्थर के औजारों में व्यापक समानताओं के अध्ययन के आधार पर कुछ इतिहासकारों का मत है कि होमोइरेक्टस का मूल स्थान अफ्रीका ही था। वह अपने मूल स्थान से निकलकर विश्व के अन्य भागों में फैल गया। बाद में वहां जाकर वह विभिन्न स्थानीय प्रजातियों के रूप में विकसित हुआ। जैसे जावा मानव, पिथेकोन्थ्रेपस,पीकिंग मानव, यूरोप का निएंडरथल आदि। लेकिन कुछ इतिहासकारों का मत है कि अफ्रिका से मानव के फैलाव और विसरण का स्वभाव एवं कारण स्पष्ट नहीं है। प्रज्ञ-मानव इतना अधिक संपन्न होता है कि वह समान पारिस्थितिकीय दशाओं में समान संस्कृति (औजार एवं हथियार) विकसित कर सकता है। इस हेतु किसी बाहरी प्रभाव की आवश्यकता नहीं होती है। यह विषय अभी वाद-विवाद का विषय बना हुआ है। दिसंबर 2009 में हुआ एक अध्ययन दर्शाता है कि चीन, जापान एवं सुदूर पूर्व एशियाई देशों की आबादी के पूर्वज भारत से गए थे। भारत सहित 10 देशों चीन, जापान, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, साउथ कोरिया, ताइवान एवं थाईलैंड के लगभग 90 वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन किया। इसके अनुसार जापानी चीनी एवं बाकी सभी पूर्वी एशियाई देशों के पूर्वज भारतीय थे। इन सभी की उत्पत्ति का मूल एक है। अतः स्पष्ट है कि भारत एशिया की जेनेटिक विविधता के छोटे रूप का प्रतिनिधित्व करता है। इस अध्ययन के अनुसार भारत से लोग दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया गए। लगभग 100000 वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रीका से सिर्फ एक समूह भारत आया। उसने भारत में सबसे पहले भू भाग पर कदम रखा, लेकिन तटीय क्षेत्रों के करीब। यह लोग जल्दी ही दक्षिण भारत में फैल गए फिर वें दक्षिण पूर्व और पूर्वी एशियाई क्षेत्र में पहुंच गए। इन भारतीयों और उनके जेनेटिक बदलाव के विविध रूप धीरे-धीरे एशिया के दूसरे हिस्सों में पसरते चले गए। अर्थात यह कहा जा सकता है कि भारतीय ही एशियाई लोगों के पुरखे हैं।
शुक्रवार, 29 सितंबर 2017
क्या मध्यपाषाण काल ही वैदिक युग था?
(प्रकाशित)
भारत में नवपाषाण काल तथा पुरापाषाण काल के बीच की अवधि के लिए मध्यपाषाण काल शब्द का प्रयोग किया जाता है, वास्तव में यह काल इन दोनों के बीच का संक्रमण काल था इसमें कुछ विशेषताएं परिमार्जित अथवा यथावत रूप में पुरापाषाण काल की भी विद्यमान रही तो कुछ ऐसी विशेषताएं भी प्रारंभिक रूप में विद्यमान रही जो नवपाषाण काल के आगमन का आभास देती है। मध्यपाषाण कालीन मानव जो अभी तक आखेटक एवं खाद्य संग्राहक था,ने कृषि एवं पशुपालन की ओर अपना प्रथम कदम बढ़ाया था ।मध्यपाषाण कालीन मानव का भारत में सर्वप्रथम प्रमाण 1867-68 में ए.सी.एल कार्लाइल द्वारा खोजा गया था ।उन्हें मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) की कैमूर पर्वत श्रंखला की गुफाओं में बड़ी मात्रा में लघु पाषाण उपकरण(मिक्रोलिथस) प्राप्त हुए थे ।भारत में मध्यपाषाण कालीन अध्ययन को गति प्रदान करने का श्रेय डॉ. एच. डी.सांकलिया को जाता है। सांकलिया ने गुजरात के अनेक स्थानों का उत्खनन कराया, जिसमें लंघनाज प्रमुख है। मध्यपाषाण काल को पुरापाषाण से पृथक करके अध्ययन करना होगा। क्योंकि इस काल में औजार निर्माण प्रद्योगिकी में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए, जिसने मध्यपाषाणकालीन मानव की जीवन शैली, जीवनचर्या एवं उसके महत्वपूर्ण रहन-सहन को बदल कर रख दिया। हालांकि पुरापाषाण काल की कुछ परंपराएं भी जारी रही, मध्यपाषाण कालीन उपकरण पुरापाषाण काल की अपेक्षा एक विस्तृत विभाग में मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि मध्य पाषाण कालीन मानव, एक विस्तृत भूभाग में रहता था। मध्य पाषाण काल 1200 ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। उस समय से ही आद्ययुग (होलोसीन ऐज) का प्रारंभ माना जाता है। इस समय जलवायु में पुनः बड़े परिवर्तन हुए। तापमान में वृद्धि हुई। तापमान में वृद्धि के फलस्वरुप पृथ्वी के बड़े भाग पर जमीं बर्फ तथा ग्लेशियर पिघलने लगे फलस्वरूप अनेक नदियों का विकास हुआ। जिनमें प्रचुर मात्रा में मछलियों की वृद्धि हुई।
फलस्वरूप आदिमानव हेतु भोजन का अपेक्षाकृत आसान एवं सुरक्षित विकल्प उपलब्ध हुआ। जमीन के हिम मुक्त हो जाने से तीव्र गति से वनस्पतियों की भी वृद्धि हुई। बड़े विशालकाय जीव लुप्तप्राय हो गए। उनके स्थान पर छोटे एवं तेज तर्रार जीव जैसे हिरण, भेड़-बकरी तथा गाय-बैल आदि तेजी से बढ़े। इस प्रकार आदिमानव के समक्ष अब नए संसाधन उपलब्ध थे ।नए संसाधनों एवं जीविका के अनेक विकल्पों ने तकनीकी में सुधार का मार्ग प्रशस्त किया। उपलब्ध अवसरों का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए मध्यपाषाण कालीन मानव ने उपकरण तकनीकी में पर्याप्त परिवर्तन किए। अब उसे छोटे एवं तीव्र उपकरणों की आवश्यकता थी ताकि उनकी सहायता से सुदूर क्षेत्र तक तथा तीव्रता से शिकार किया जा सके। अतः उसने लघुपाषाण उपकरणों का विकास किया। यह उपकरण अत्यंत लघु आकार के थे। वह लगभग आधे इंच से लेकर पौन इंच के होते थे। इन उपकरणों में पुरापाषाण कालीन उपकरणों के लघुरूप भी शामिल थे, जैसे बरछी,तीर, आरी अथवा दरांती,ब्लेड,छिद्रक, स्क्रेपर,ब्यूरिन, बेधक एवं चांद्रिक आदि। कुछ स्थानों से अस्थि निर्मित उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। कुछ नए उपकरण जैसे लुनेट,ट्रेपीज़, त्रिभुज तथा धनुष बाण भी प्राप्त हुए हैं। यह लघु उपकरण संयुक्त उपकरणों की भांति प्रयुक्त किए जाते थे। इन्हें लकड़ी अथवा हड्डी के हत्थे में फिट कर के उपयोग में लाया जाता था।
मध्य पाषाण कालीन पुरास्थल, पुरापाषाण कालीन पुरास्थलों की तुलना में कहीं अधिक प्राप्त होते हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि मध्यपाषाण काल में जनसंख्या में तीव्र वृध्दि हुई थी। इस काल में मानव ने उन स्थानों पर भी बस्तियां बसाई जहां पुरापाषाण कालीन मानव नहीं पहुंच पाया था। उदाहरणार्थ:- दक्षिण-मध्य उत्तर प्रदेश के गंगा मैदानों में भी मध्य पाषाणकालीन मानव बस्तियां पाई गई हैं। भीमबेटका के सभी शैलाश्रयों से मध्य पाषाणकालीन संस्कृति के प्रमाण मिले हैं जबकि पुरापाषाण कालीन संस्कृतियों के प्रमाण बहुत कम शैलाश्रयों से प्राप्त हुए हैं। यह बात भी मध्य पाषाणकालीन जनसंख्या वृद्धि का ही प्रमाण है।
मध्यपाषाण कालीन समाज
जलवायु परिवर्तन के सकारात्मक प्रभाव होने मध्य पाषाण कालीन समाज को कई प्रकार से प्रभावित किया:
# जीव-जंतु एवं वनस्पतियों की तीव्र वृद्धि
# अनेक सदा वाही नदियों का विकास # मत्स्ययन का का प्रचार विकास
# जनसंख्या वृद्धि
# बस्तियों का विस्तार
प्रायद्वीपीय भारत में मध्य पाषाण कालीन प्रस्तर उद्योग का आधार स्फटिक पत्थर है। जलालहल्ली ( बेंगलुरु, कर्नाटक) के आसपास विशिष्ट स्फटिक उद्योग का संचालन किया जाता था।लघु प्रस्तर उपकरणों की सहायता से अब मनुष्य अधिक कुशल हो गया।भोजन की प्रचुरता (पर्याप्त वनस्पति तथा मांस) के कारण जीवन की गुणवत्ता में बदलाव आया। मृत्यु दर पहले की अपेक्षा काफी कम हो गई। स्त्री पुरुष दोनों का स्वास्थ्य अच्छा होने के कारण कुल प्रजनन दर में भी वृद्धि हुई इसके परिणाम स्वरुप भी जनसंख्या बढ़ने लगी।
मध्य पाषाण कालीन मानव के खानाबदोश जीवन में भी पहले की अपेक्षा बदलाव हुआ। भोजन के अन्य विकल्प (वनस्पति एवं मछलियां आदि) उपलब्ध होने के कारण वह अपना खाली समय अन्य गतिविधियों में लगा सकता था- जैसे हाथों से मृदभांडों का निर्माण, चोपानीमांडो, लंघनाज तथा बागोर से हस्तनिर्मित अनगढ़ मृदभांड प्राप्त हुए हैं, चोपानीमांडो के मृदभाडों को रस्सी दबा कर बनाई गई आकृतियों से सजाया गया है।घर के लिए घास-फूंस के छप्परों का निर्माण तथा सबसे महत्वपूर्ण चित्रकारी निर्माण। भारत में प्राप्त अधिकांश शैल चित्र इसी काल से संबंधित हैं। यह शैलचित्रों के रूप में है। जिनमें मध्यपाषाण कालीन मानव की रचनात्मकता का तो पता चलता ही है, साथ ही उनके दैनिक सामाजिक-आर्थिक क्रियाकलापों को भी समझा जा सकता है। भीमबेटका के शैलचित्र विश्व प्रसिद्ध है। चील, काराकोरम,गिलगिट, लेह, बुर्जहोम (सभी कश्मीर में) कोप्पागल्लू तथा संगनकल्लू (कर्नाटक) से भी अनेक शैलचित्र मिले हैं। विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट है कि अब सिर्फ मांस ही भोजन का प्रमुख स्रोत नहीं था। चक्की, सिलबट्टे, हस्तनिर्मित मृदभांड के पुरातात्विक साक्ष्य तथा पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्यों की उपलब्धि इस बात की पुष्टि करती है।
(जिनकी कालावधि कार्बन डेटिंग के अनुसार 8000 ईसापूर्व से 2000 ईसापूर्व निर्धारित की गई है, अर्थात नवपाषाण काल तथा ताम्र पाषाण काल की समानांतर भी यह काल विद्यमान था) बागोर (राजस्थान), आदमगढ़ (मध्य प्रदेश) तथा लंघनाज (गुजरात) में गाय-बैल। भेड़-बकरी पालन के प्राचीनतम साक्ष्य उपलब्ध होते हैं। अवश्य ही मांस के अतिरिक्त अन्य पशु उत्पादों जैसे दूध, गोबर (जलावन हेतु), सींग आदि भी पशुपालन का उद्देश्य रहा होगा। यह पालतू पशु एक प्रकार से अतिरिक्त मांस का भंडार थे। इनका आवश्यकता पड़ने पर भोजन हेतु प्रयोग किया जा सकता था। बागोर से डी एन मिश्रा को पशु वधशाला के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस काल में संभवतः पति-पत्नी वाले परिवारों की भी आदिम अवस्था में शुरुआत हो चुकी थी। सामान्यतः एक कब्र में एक ही व्यक्ति दफनाया जाता था। लेकिन सराय नाहर राय (प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश) से एक साथ एक ही कब्र में 4 व्यक्तियों को दफनाने का भी प्रमाण मिला है। इनमें दो पति तथा दो पत्नियां हैं। स्त्री पुरुष के वामांग की ओर है। शवों के साथ दैनिक कार्यों में उपयोग आने वाली वस्तुएं भी हैं जो उनके पुनर्जन्म में विश्वास का द्योतक है। सराय नाहर राय, लंघनाज तथा बागोर से शवाधानों के प्रमाण मिले हैं यह भारत में शवाधान के सबसे प्राचीन प्रमाण हैं। शवों को घर के अंदर ही दफनाया जाता था। इस काल का मानव कच्ची झोपड़ियों तथा गुफाओं में रहता था। झोपड़ियां घास-फूंस तथा वृक्षों की टहनियों आदि से निर्मित होती थी:-जैसी की ग्रामीण भारत में आज भी देखने को मिल जाती हैं। खंबे गाड़कर झोपड़ियों की दीवार को सहारा दिया जाता था तथा फर्श को पत्थरो की सहायता से पक्का किया जाता था। इस काल का मानव पहले की अपेक्षा अत्यधिक क्रियाशील, विवेकशील तथा रचनात्मक था। उसने अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति देने के लिए चित्र बनाएं एवं स्वयं को सुंदर दिखाने के लिए आभूषण बनाए तथा भोजन आदि आवश्यक्ताओं के लिए हस्तनिर्मित मृदभांड बनाएं। शिकार के लिए सुंदर प्रभावी तथा छोटे उपकरण बनाए। कीमती पत्थरों का मितव्यता से प्रयोग किया तथा उनकी बर्बादी को नियंत्रित किया।
मध्यपाषाण कालीन संस्कृति का विस्तार
मध्य पाषाणकालीन लोग देश के कुछ क्षेत्रों जैसे केरल, बंगाल डेल्टा, उत्तर पूर्वी भारत तथा पंजाब के मैदानों को छोड़कर लगभग संपूर्ण भारत में फैले थे। मुख्यतः उत्तरी गुजरात, मारवाड़, मेवाड़ (राजस्था इलाहाबाद-मिर्जापुर में गंगा के कछारी मैदान (दक्षिण-मध्य उत्तर प्रदेश) में अनेक मध्य पाषाणकालीन कालीन स्थल मिले हैं। संगनकल्लू (बेल्लारी,कर्नाटक) तूतीकोरिन (तमिलनाडु) कुचाई (मयूरभंज, उड़ीसा), वीरभानपुर (पश्चिम बंगाल) सराय नाहर राय, महादहा, दमदमा (प्रतापगढ), लेखानिया (मिर्जापुर) मोरहाना पहाड़ (मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश) चोपानीमांडव (बेलन घाटी मेजा तहसील इलाहाबाद), आदमगढ़ (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) भीमबेटका (मध्य प्रदेश), लंघनाज(महेसाणा, गुजरात आवाज मलखान वीरपुर गुजरात), तिलवाड़ा (बाड़मेर जिला) तथा बागौर (भीलवाड़ा राजस्थान, कोठारी नदी पर स्थित भारत का सबसे बड़ा मध्य पाषाण स्थल है, सर्वाधिक अन्वेषण भी यहीं पर किया गया है) पटणे (महाराष्ट्र), बरकच्छा, सिद्ध पुर तथा बाराशिमला (मध्य भारत के पहाड़ी क्षेत्र में), गिध्दलूर,रेणिगुंटा, नागार्जुन कोंडा (आंध्र प्रदेश) आदि प्रमुख मध्य पाषाणकालीन स्थल हैं। तूतीकोरिन में लघुपाषाण उपकरण, लाल रेतीले टीलों (टेरी टीलों का स्थानीय नाम) में दबे पाए गए हैं। इन्हें टीलों के नाम पर टेरी उपकरण कहा जाता है। टेरी उद्योग का प्रमुख कच्चा माल स्फटिक तथा हल्का भूरा श्रृंग प्रस्तर है। कासुशोल, जनमिरे बाभलगो तथा जलगढ़ (सभी कोंकण तट पर), कालीकट गोवा, किब्बनहल्ली तथा गिध्दलूर (पूर्वी घाट), नागार्जुनकोंडा, बेलगाम, बेरापेडी गुफा, संगनकल्लू,जमुनीपुर (फूलपुर तहसील इलाहाबाद), कुढ़ा, बिछिया,भीखपुर,तथा मरुडीह (कोरांव तहसील इलाहाबाद), मोरहानापहाड़ (उत्तर प्रदेश) के शैलाश्रयों में दो तथा चार पहियों वाले रथों को धनुष बाण तथा भाले लिए सैनिक समूह द्वारा घेरे हुए चित्रित किया गया है। यह प्रश्न उठता है कि क्या मध्य पाषाणकालीन लोग ही वैदिक जन थे? इस प्रश्न की पड़ताल आवश्यक है क्योंकि रथ वैदिक जनों (आर्यों) का ही प्रमुख वाहन था। रथ का वैदिक युग में महत्वपूर्ण स्थान था। अंत में हम कह सकते हैं कि मध्य पाषाणकालीन मानव ने पहले की अपेक्षा अंशतः स्थिर जीवन की शुरुआत कर दी थी । दावे के साथ उसके जीवन की स्थिरता के बारे में कहना तो मुश्किल है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि अब कम से कम एक स्थान पर जहां पर्याप्त भोजन, पानी उपलब्ध था उसके ठहरने की अवधि काफी लंबी हो गई थी।कहा जा सकता है कि आदिम रूप में कृषि पशुपालन तथा स्थिर अधिवास की नींव पड़ चुकी थी। मध्य पाषाण काल, पुरापाषाण तथा नवपाषाण काल के बीच संक्रमण काल था, इसी ने नवपाषाण संस्कृति की आधारशिला रखी थी।
मध्यपाषाण कालीन पुरातात्विक साक्ष्य बड़े पैमाने पर रथ, घुड़सवार,एवं यद्ध के दृश्य ऋग्वैदिक जीवन की और संकेत करते हैं।अतः क्या मध्यपाषाण काल ही वैदिक युग था,इस दिशा में अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।
(प्रस्तुत लेख लेखक का निजी शोधपत्र है)