यद्यपि भारत में ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों की कालावधि कांस्य युग के बाद की है तथापि कुछ ताम्रपाषाणिक संस्कृतियां हड़प्पा-पूर्व तथा परिपक्व हड़प्पा कालीन भी हैं।गणेश्वर (2800 ई.पू.-2200ई.पू.) परिपक्व हडप्पा कालीन ताम्रपाषाणिक स्थल है।गणेश्वर, खेतड़ी की ताम्र खदानों के समीप था जो हड़प्पा को ताम्र उपकरणों की आपूर्ति करता था।यहां से अनेक ताम्र उपकरण जैसे मछली पकड़ने के कांटे तथा बाणाग्र मिले हैं।वे हड़प्पा से प्राप्त उपकरणों के समान हैं।यहां से हड़प्पाई मृदभांडों के समान मृदभांड का एक टुकड़ा भी प्राप्त हुआ है।
गणेश्वर से काले रंग से रँगी चित्रित धूसर मृदभांड भी प्राप्त हुए हैं।वास्तव में गणेश्वर से प्राप्त सामग्री न तो नगरीय है और न ही पूर्णतः चित्रित धूसर मृदभांड।यहां से ताम्र निधि संस्कृति के अवशेष मिले हैं।अर्थात यह एक पूर्व हडप्पा कालीन ताम्रपाषाणिक स्थल है जिसने परिपक्व हड़प्पा के उदय में योगदान किया।कालीबंगा, बनावली(हरियाणा),कोटदीजि (सिंध) आदि स्थलों से हडप्पा सभ्यता के तीनों चरण के अवशेष मिले हैं।जो इनके ताम्रपाषाण से परिपक्व हड़प्पाई स्थल में विकसित होने का प्रमाण है।।
सिंध के कई स्थल पूर्व हडप्पा सभ्यता के केंद्रीय स्थल का निर्माण करते हैं। यह संस्कृति ही बाद में विकसित एवं परिपक्व सभ्यता में परिवर्तित हो गई और इसने सिन्ध तथा पंजाब में शहरी सभ्यता को जन्म दिया।
पाकिस्तान के पुरातत्वविद डॉ एम आर मुगल एवं फ़ज़ल खान ने चोलिस्तान पर अनुसंधान कार्य किया है।पाकिस्तान के चोलिस्तान क्षेत्र में 4000 ई.पू. में अनेक पूर्व हड़प्पाई कृषि अधिवास विकसित हुए तथापि प्रारम्भिक कृषि अधिवास ब्लूचिस्तान में 7000 ई.पू. विकसित हुए थे।पांचवीं, चौथी सहस्राब्दी में अन्नागार बनाये जाने लगे थे तथा गारे की ईंटो (कच्ची ईंट) का भवन निर्माण में प्रयोग होने लगा था।पालिशदार मृदभांड तथा टेराकोटा की स्त्री मृण्मूर्तियों (मातृ देवी-शक्ति उपासना) का भी निर्माण होने लगा था।
व उत्तरी ब्लूचिस्तान में रहमान ढेरी सर्वप्रथम नियोजित नगर के रुप में विकसित हुआ।यहां नियोजित सड़कें तथा घर थे।यह स्थल पश्चिम में हडप्पा के समानांतर अवस्थित था।इस प्रकार प्रारम्भिक तथा परिपक्व हड़प्पा सभ्यता ब्लूचिस्तानी अधिवासों से विकसित हुई थी।हाकरा तथा प्रारम्भिक हाकरा संस्कृतियों एम आर मुगल द्वारा चोलिस्तान क्षेत्र में उत्खनन तथा ए एच दानी द्वारा उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त में गंधार शवाधानों का उत्खनन कराया गया है।जहां से महत्वपूर्ण साक्ष्य प्राप्त हुए है।
अंततोगत्वा, विभिन्न प्रारम्भिक हड़प्पाई ताम्रपाषाण संस्कृतियों ने सिंध,ब्लूचिस्तान,राजस्थान तथा अन्य स्थानों में कृषि समुदायों के फैलाव को प्रोत्साहित किया।जिसने हडप्पा की नगरीय सभ्यता के उदय की पृष्ठभूमि हेतु परिस्थितियां तैयार की।इस संदर्भ में सिंध में कोटदीजि तथा आमरी एवं राजस्थान में कालीबंगा तथा गणेश्वर के दृष्टांत उल्लेखनीय हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कुछ ताम्रपाषाणिक कृषक समुदाय सिंधु नदी के बाद के मैदानों की ओर बढ़े तथा उन्होंने कांस्य तकनीकी सीखी और विभिन्न सहायकों कारकों की मदद से नगरों की स्थापना में सफल हुए।जिसमें एक प्रमुख कारक कृषि अधिशेष उत्पादन तथा उसके कारण गैर-कृषक समुदायों को उत्पत्ति एवं हाट बाजारों की शुरुआत भी था।
कभी कभी हडप्पा सभ्यता की उतपत्ति का श्रेय प्रकृतिक पर्यावरण को भी दिया जाता है हड़प्पा क्षेत्र का आधुनिक पर्यावरण भले ही शुष्क तथा अर्धशुष्क हो लेकिन 3000 ई.पू.-2000 ई.पू. में हमें यहां पर्याप्त वर्षा तथा सिंधु एवं इसकी सहायक नदियों सरस्वती/हाकरा में प्रचुर जल बहाव के साक्ष्य प्राप्त होते हैं अर्थात स्पष्ट है कि इस प्रकार के अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण ने भी हडप्पा सभ्यता के उदभव में सकारात्मक भूमिका अदा की।
हडप्पा के संस्थापक
कई इतिहासकार तथा भौतिक नृ- वैज्ञानिकों ने मोहनजोदड़ो की कंकाल सामग्री के अध्ययन के आधार पर हड़प्पा वासियों को अनेक प्रजातियों में विभाजित किया है:
आद्यआस्ट्रेलायड, भूमध्यसागरीय, एल्पाइन एवं मंगोलाभ।
लेकिन आधुनिक भौतिक नृवैज्ञानिक इस अवधारणा का खंडन करते हैं उनका मानना है कि:
* हडप्पा,मोहनजोदड़ो तथा लोथल के लोगों की नाक चपटी थी।
* दूसरा निष्कर्ष यह है कि अन्य दोनों स्थलों के लोगों की तुलना में लोथल के लोगों का सिर भी चौड़ा था।
* हड़प्पा की कंकाल सामग्री के आधार पर इतिहासकारों का मत है कि इनमें से प्रत्येक स्थल की जनसंख्या कम से कम सिर तथा नाक के आकार एवं कद की दृष्टि से एकसार थी अर्थात उनकी अपनी अपनी मूल रचना चाहे जैसी भी रही हो इनमें प्रत्येक स्थल की जनसंख्या एक ही जीव वैज्ञानिक समूह से सम्बद्ध थी।उनका सम्बन्ध ऐसी भिन्न भिन्न प्रजातियों से नही जोड़ा जा सकता है जिनकी शारीरिक विशेषताएं भिन्न हों। डी के सेन का मत है कि पंजाब,सिंध की जनसंख्या चपटी नाक,ऊंचे कद तथा लंबे सिर वाली थी जबकि गुजरात के लोगों का सिर गोल-मटोल था।
स्मरणीय है कि इन लोगों के शारीरिक प्रारूपों का किसी युग या क्षेत्र विशेष की संस्कृति या सभ्यता से कोई सीधा संबंध नही था।निष्कर्षतः, हडप्पा सभ्यता के सृष्टा, मामूली परिवर्तनों के साथ, इस सभ्यता के वर्तमान क्षेत्रों के लोगों के पूर्वज ही थे।इस बात की पुष्टि इंस्टिट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटेग्रेटेड बायोलॉजी (इजिब) के मानव जीनोम प्रोजेक्ट के निष्कर्षों से भी हो जाती है।इस प्रोजेक्ट का प्रमुख निष्कर्ष है कि "विभिन्न प्रजातियों में जीन के आधार पर विभेद कठिन है।सभी की मूल जैविक संरचना समान है।"
(लेखक राज्यकर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर है, प्रस्तुत लेख लेखक का निजी शौध-पत्र है)
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
स्थानीय निवासी थे हडप्पा के शिल्पी
सोमवार, 25 सितंबर 2017
कश्मीर: भारत का अविभाज्य अंग है।
जिस कश्मीर के बारे में मुगलिया बेगम कह उठी थी कि धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं है,यहीं है, आज वह कुछ ऐतिहासिक भूलों के कारण खूनी आंसू बहा रहा है।
26 अक्टूबर 1947 को विधिवत रूप से कश्मीर के भारत में विलय के बावजूद भारत के अतिरिक्त अवैध रूप से कश्मीर पर चीन एवं पाकिस्तान का भी कब्जा है।जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, तो "पाक अधिक्रान्त जम्मू एवं कश्मीर"(पी ओ जे के) और गिलगित बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। अक्साईचिन पर चीन का अवैध कब्जा है। पाकिस्तान द्वारा अधिक्रान्त जम्मू कश्मीर में मुख्यतः मीरपुर,मुजफ्फराबाद और गिलगिट-बाल्टिस्तान का क्षेत्र आता है जिसे कुटिल रणनीति के तहत पाकिस्तान द्वारा दो हिस्सों में बांट दिया गया है।उत्तरी क्षेत्र-गिलगिट बाल्टिस्तान एवं कथित आज़ाद कश्मीर जिसमे मीरपुर और मुजफ्फराबाद का क्षेत्र शामिल है जहां के नागरिक परतंत्र एवं पाशविक जीवन जीने को अभिशप्त हैं।
पाक अधिक्रान्त जम्मू एवं काश्मीर"(पी ओ जे के) का कुल क्षेत्रफल लगभग 13 हजार वर्ग किलोमीटर है एवं जनसँख्या लगभग 30 लाख हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अक्साई चिन शामिल नहीं है। यह क्षेत्र महाराजा हरिसिंह के समय में कश्मीर का हिस्सा था लेकिन 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद कश्मीर के उत्तर-पूर्व में चीन से सटे क्षेत्र अक्साई चिन पर चीन ने बलात कब्जा कर लिया। भारत ने जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा में पाक अधिक्रान्त जम्मू एवं कश्मीर (पीओजेके) के लिए 25 सीटें और संसद में 7 सीटें सुरक्षित रखी हुई हैं।
इस अनाधिकृत जम्मू कश्मीर को लेकर पाकिस्तान फॉक्स-पालिसी (लोमड़ी-नीति) का अनुसरण कर रहा है। एक और तो वह इसे आजाद कश्मीर कहता है तो दूसरी ओर यहां के प्रशासन और राजनीति में सीधा दखल करके यहां के सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने में लगा है। पाकिस्तान ने यहां पर बाहरी लोगों को बसाकर क्षेत्र के जनांकिय संतुलन को बिगाड़ने का कोई अवसर नही गंवाया है। यहां का शासन मूलत: इस्लामाबाद से सीधे तौर पर संचालित होता है।
49 सीटों वाली पीओजेके विधानसभा के लिए 1974 से ही वहाँ छद्म चुनाव कराए जा रहे हैं और दिखावे के लिए प्रधानमंत्री भी चुना जाता है। जिसे दुनिया का कोई भी देश मान्यता नही देता है।
पाकिस्तान इसे आजाद कश्मीर के रुप मे प्रचारित करता है जबकि पाकिस्तान पर पीओजेके की निर्भरता, किसी से छुपी हुई नहीं है। गिलगिट व बाल्टिस्तान को पहले पाकिस्तान में उत्तरी क्षेत्र कहा जाता था और जिसका प्रशासन संघीय सरकार के अंतर्गत एक मंत्रालय चलाता था। 2009 में पाकिस्तान की संघीय सरकार ने यहां एक स्वायत्त प्रांतीय व्यवस्था प्रारम्भ कर दी जिसके अंतर्गत मुख्यमंत्री सरकार चलाता है। यहाँ छद्म रूप से चयनित 24 लोंगो की परिषद है जिसके पास कोई विशेष अधिकार नही है।
विवादित गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र को पाकिस्तान अपना पांचवां प्रांत घोषित करने का षड्यंत्र कर रहा है। पाकिस्तान यह कदम चीन को खुश करने के लिए उठाना चाहता है क्योंकि चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यहां से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र की संवैधानिक स्थिति में किसी भी प्रकार का बदलाव भारत के लिए सहनीय नही है क्योंकि यह क्षेत्र भारत का हिस्सा है।
खुद यहां की जनता पाकिस्तान की इस सोच के विरोध में सड़कों पर उतर आई है।
शिया बाहुल्य इस क्षेत्र में पाकिस्तानी फौज आये दिन बर्बरता पूर्वक अत्याचार करती है।शिया आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।यहाँ से अनेक लोग पाकिस्तानी अत्याचारों से पीड़ित होकर जम्मू एवं कश्मीर में आकर बस गए हैं और अभी भी उनका आना जारी है।
पीओजेके, मूल कश्मीर का वह भाग है, जिसे पाकिस्तान ने 1947 में आक्रमण करके हथिया लिया था। भारत और पाकिस्तान के बीच यही विवादित क्षेत्र है। इसकी सीमाएं पाकिस्तानी पंजाब एवं उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत से पश्चिम में, उत्तर पश्चिम में अफ़गानिस्तान के वाखान गलियारे से, चीन के ज़िन्जियांग उयघूर स्वायत्त क्षेत्र से उत्तर और भारतीय कश्मीर से पूर्व में लगती हैं। इस क्षेत्र के पूर्व कश्मीर राज्य के कुछ भाग, ट्रांस-काराकोरम ट्रैक्ट को पाकिस्तान द्वारा चीन को अवैध रुप से उपहार में दे दिया गया था व शेष क्षेत्र को दो भागों में बांट दिया गया था: उत्तरी क्षेत्र एवं आजाद कश्मीर। इस विषय पर पाकिस्तान और भारत के बीच 1947 में युद्ध भी हुआ था। भारत द्वारा इस क्षेत्र को पाक अधिकृत कश्मीर (पी.ओ.जे.के) कहा जाता है।संयुक्त राष्ट्र सहित अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं,एम.एस.एफ़,एवं रेड क्रॉस द्वारा इस क्षेत्र को पाक-अधिकृत कश्मीर ही कहा जाता है।
महाराजा हरि सिंह, ने भारत के विलय प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इस विलय समझौते के बाद भारत ने पाकिस्तान के कबायली आक्रमण से जम्मू कश्मीर की रक्षा के लिए सेना को घाटी में भेजा था। महाराजा हरि सिंह से हुई संधि के परिणामस्वरूप पूरे कश्मीर राज्य पर भारत का अधिकार स्वयंसिद्ध है। फलतः सम्पूर्ण कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है।
गिल्गित बाल्टिस्तान में काराकोरम राजमार्ग पर हजारों की संख्या में पाषाण-कला एवं पेट्रोग्लिफ के शिलाओं पर उत्कीर्ण कलाकृतियां मिलती हैं। इनमें से अधिकांश कलाकृतियां हुन्ज़ा एवं शातियाल के बीच दस प्रमुख स्थलों में स्थित हैं। ये कलाकृतियां इस मार्ग से निकलने वाले आक्रमणकारियों, व्यापारियों एवं तीर्थयात्रियों एवं स्थानीय निवासियों द्वारा उत्कीर्ण की गई थी।इनकी अवधि ई.पू. 5000 से ई.पू. 1000 वर्ष के मध्य मानी जाती है। साधारण पशुओं, तिकोनी मानव आकृतियां हैं, प्रमुख रूप से उत्कीर्ण किये गए हैं। इनमें आखेट के दृश्य हैं, जहां पशुऒं का आकार मनुष्यों से बहुत बड़ा दिखाया गया है। इन कलाकृतियों को पाषाण-उपकरणों द्वारा तराश कर एक मोटी पैटिना की पर्त से ढंक दिया गया था, जिससे इनकी आयु का ज्ञान होता है। इस क्षेत्र के इतिहास की जानकारी पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों से कई शिलालेखों से एकत्रित कर पुरातत्त्ववेत्ता कार्ल जेटमार ने अपनी पुस्तक "रॉक कार्विंग्स एण्ड इन्स्क्रिप्शन्स इन द नॉर्दर्न एरियाज़ ऑफ पाकिस्तान" में एवं बाद में एक अन्य पुस्तक "बिटवीन गांधार एण्ड द सिल्क रोड्स - रॉक कार्विंग्स अलॉन्ग द काराकोरम हाइवे" में लिखे हैं।
1947 से 1970 के मध्य पाक-अधिकृत जम्मू एवं कश्मीर का पूर्ण क्षेत्र दिखावे के रूप में प्रशासित होता रहा। इसके अतिरिक्त हुन्ज़ा-गिलगित के एक भाग, रक्सम एवं बाल्टिस्तान की शक्स्गम घाटी क्षेत्र को, पाकिस्तान द्वारा 1963 में चीन को अवैध रूप से सौंप दिया गया था। इस क्षेत्र को सीडेड एरिया या ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट कहते हैं।
1970 के बाद पाक अधिकृत जम्मू एवं कश्मीर को पाकिस्तान ने दो भागों में बांटा दिया ताकि विवाद निपटान की स्थिति में उसे कुछ न कुछ हिस्सा प्राप्त हो सके।
1-कथित आजाद कश्मीर
2-उत्तरी क्षेत्र।
गिल्गित क्षेत्र महाराजा हरिसिंह द्वारा ब्रिटिश सरकार को पट्टे पर दिया गया था। बाल्टिस्तान लद्दाख का पश्चिम हिस्सा था, जिस पर पाकिस्तान ने 1948 में ही बलात कब्जा कर लिया था। ये क्षेत्र विवादित जम्मू एवं कश्मीर क्षेत्र का भाग है।
अक्साई चिन
अक्साई चिन नामक क्षेत्र जो पूर्व जम्मू एवं कश्मीर राज्य का भाग था, पाक अधिकृत कश्मीर में नहीं आता है। ये 1962 में चीन ने हड़प लिया था। जम्मू एवं कश्मीर को अक्साई चिन क्षेत्र से अलग करने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा कहलाती है।
1947 में पाकिस्तान द्वारा कबायली आक्रमण के समय भारत सरकार पाकिस्तान द्वारा यथास्थित समझौते का अतिक्रमण करके कश्मीर पर किये गए आक्रमण एवं कश्मीरी नागरिकों पर किये गए जुल्मों के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ में गई थी।जहां भारत मे जम्मू कश्मीर के अधिमिलन का कोई प्रश्न नही उठाया गया था।भारत ने स्पष्ट कर दिया था भारत मे जम्मू कश्मीर का अधिमिलन पूर्णतः संवैधानिक एवं अविवादित है एवं उस ओर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ उचित मंच नही है।
रविवार, 24 सितंबर 2017
रोड-गॉड बना मानव फाउंडेशन
मानव फाउंडेशन सहारानपुर जनपद में रोड-गॉड के रूप में पहचान बना रहा है।सन 2013 में पंजाब के बरनाला जनपद निवासी सरदार रेशम सिंह ने एक दुर्घटना से द्रवित होकर मानव वेल्फेयर सोसायटी की स्थापना की और अपने जन्मदिन पर दुर्घटना पीड़ितों के लिए 24 घण्टे उपलब्ध रहने वाली एम्बुलेंस सड़क पर उतार दी।रेशम सिंह अम्बाला रोड पर सरसावा के पास शाजहाँपुर में मानव पंजाबी ढाबा चलाते हैं।यह ढाबा मेन हाइवे पर स्थित है,रोड पर क्षमता से अधिक वाहनों का लोड है जबकि रोड की चौड़ाई कम होने के कारण यहां सड़क दुर्घटना सामान्य बात है।दुर्घटना में घायलों के समय पर इलाज न मिलने के कारण अनेक घायल घटनास्थल पर हो दम तोड़ देते हैं।सरकारी एम्बुलेंस सेवा 108 के देर से पहुंचने और पुलिसया कार्यवाही के कारण दुर्घटना पीड़ित सड़क पर ही दम तोड़ देते हैं।इसी बात ने निजी एम्बुलेंस सेवा के विचार को बल दिया।आस पास के लोगों और थाने में भी मानव एम्बुलेंस सेवा का फोन नम्बर उपलब्ध है।फोन और किसी दुर्घटना की जानकारी मिलते ही मानव फाउंडेशन के कार्यकर्ता दुर्घटना स्थल पर दौड़ पड़ते है और पीड़ित को अतिशीघ्र चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराते है।खास बात यह है कि बिना किसी सरकारी सहायता और चंदे की निजी खर्चे पर ही मानव फाउंडेशन निशुल्क एम्बुलेंस सेवा प्रदान कर रहा है।2013 में ही वाणिज्यकर विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर सुनील सत्यम एक जांच के सिलसिले में मानव पंजाबी ढाबा पहुंचे तो वह रेशम सिंह के कार्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी इस कार्य से खुद को जोड़ लिया।सुनील सत्यम स्वयं भी कई बार घायलों को स्वयं की गाड़ी से हॉस्पिटल पहुंचा चुके हैं।हाल ही में रामपुर मनिहारान के सड़क दुर्घटना में घायल दो युवकों काका और अनुराग को उन्होंने 108 एम्बुलेंस और पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले ही अस्पताल पहुंचाया था।जिनमे से अनुराग के सिर में गम्भीर चोट आई थी।डाक्टरों के अनुसार यदि उसे सहायता मिलने में 10 मिनट की भी देरी हुई होती तो उसकी जान जा सकती थी।लगभग एक महीना मलाना के हॉस्पिटल में आईसीयू में रहने के बाद अनुराग की जान बचाई जा सकी।
मानव फाउंडेशन की इस एम्बुलेंस में सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मदद के लिए
बीस हजार रुपये हमेशा नकद रहता है ताकि अवश्यक्तानसुआर डॉक्टर को इलाज के लिए भुगतान किया जा सके।मरीज के परिजनों के आने पर यह धनराशि उनसे वापस मिल जाती है।कभी कभी कोई पीड़ित ज्यादा गरीब होता है तो उससे चिकित्सा पर खर्च हुआ पैसा वापस नही लिया जाता है।
मानव फाउंडेशन के सरदार रेशम सिंह और सुनील सत्यम का कहना है कि वह इस पवित्र कार्य का और ज्यादा क्षेत्र तक विस्तार करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए अभी उनके पास पर्याप्त फंड नही है लेकिन वे इसके लिए इंतजाम करने के प्रयास में लगे हैं ताकि एम्बुलेंस की संख्या बढ़ाकर अधिकतम दुर्घटना पीड़ितों की जान बचाकर उनके परिवारों में खुशियां लौटाई जा सके।
पिछले लगभग 4 वर्षों में मानव एम्बुलेंस 750 से अधिक दुर्घटना पीड़ितों को मदद पहुंचा चुकी है।जिनमें से कुछ भाग्यशाली थे जिनकी जान बचाई जा सकी लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी मौके पर मौत हो गई ऑफ उनके शव मानव एम्बुलेंस ने उठाकर पोस्ट मार्टम गृह पर पहुंचाएं।मानवता एक इसकार्य के कारण ही फाउंडेशन ने एम्बुलेंस का तथा अपना नाम मानव ही रखा है। लोगों की निशुल्क एवं त्वरित मदद के लिए मानव फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं को लोग "रोड-गॉड" कहनें लगे हैं लेकिन रेशम सिंह और सुनील सत्यम ऐसा नही मानते हैं उनका कहना है कि "हम तो सिर्फ उस ईश्वर के नेक बन्दे" बनना चाहते हैं, लेकिन लोग क्या कहते और समझते है यह उनकी भलमनसाहत को प्रकट करता है।
शनिवार, 23 सितंबर 2017
सिंध: इतिहास के गर्भ में पल रहा देश
सिंध:इतिहास के गर्भ में पल रहा देश
-------------- ------@सुनील सत्यम
सिंधु नाम आता है तो हर हिंदुस्तानी एक स्वाभाविक जुड़ाव महसूस करता है।बचपन से हम राष्ट्रगान गाकर बड़े हुए है।जिसमे तीसरी पंक्ति में पंजाब,सिंध,मराठा,द्रविड़ उत्कल बंग, शब्द आते हैं।हम सिंध शब्द के अस्तित्व के बिना देश के राष्ट्रगान की कल्पना नही कर सकते हैं।यदि इस शब्द को राष्ट्रगान से निकाल दिया जाए तो क्या राष्ट्रगान का कुछ महत्व रह जायेगा।हमने कभी यह विचार क्यों नही किया कि क्या सिंध के बिना हिन्द का कोई अर्थ है।हिंदुस्तान की सभ्यता का जन्मस्थल ही सिंधु नदी रही है।सिंधु के बिना हिन्द वैसा ही है जैसे मां के बिना उसके पुत्र!
आडवाणी ने दिल्ली में आयोजित इंडिया फाउंडेशन अवेयरनेस प्रोग्राम के दौरान कहा कि मैं किसी देश का नाम नहीं लेना चाहूंगा लेकिन एशिया में कुछ देश ऐसे हैं निसे भारत को संबंध सुधारने की जरूरत है। अगर ऐसा होता है तो मुझे खुशी होगी। उन्होंने कहा कि जहां मेरा जन्म हुआ है वह सिंध है और आज वह भारत का हिस्सा नहीं है। मुझे इस बात का दुख है। उन्होंने जोर देकर कहा था कि सिंध के बिना भारत अधूरा है।
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अतीत-मंथन
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भौगोलिक रूप से पाकिस्तान में स्थित सिंधु प्रान्त की लंबी सीमा रेखा भारत के राजस्थान एवं गुजरात प्रान्त से लगती है।सिंध में अभी भी कई ऐसे जिले हैं जहां हिंदुओ की आबादी आधे से कुछ ज्यादा या कुछ ही कम है।पाकिस्तान की कुल हिन्दू आबादी का लगभग 95 फीसदी हिंदू सिंध प्रांत में हैं। थारपकड़ में ज्यादातर जमीनें हिंदुओं की हैं। सिंध के केवल थारपकड़ जिले में ही हिंदू बहुसंख्यक हैं-51 प्रतिशत। अन्य जिले जहां हिंदुओं की बड़ी आबादी है, वे हैं-मीरपुर खास (41 फीसदी), सांघर (35 फीसदी), उमरोकट (43 फीसदी)। करीब 82 फीसदी पाकिस्तानी हिंदू निचली जातियों से हैं, जिनमें से ज्यादातर श्रमिक हैं। जिन शहरों में हिंदुओं की आबादी है, वे हैं-कराची, हैदराबाद, जाकोबाबाद, लाहौर, पेशावर और क्वेटा।
पाकिस्तान के निर्माण के बाद पाकिस्तानी हुकूमत पर पंजाबी वर्ग का वर्चस्व स्थापित हो गया।शासन प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर पंजाबी हावी हो गए।सेना पर भी इसी वर्ग ने वर्चस्व स्थापित कर लिया जिसके कारण सिंध,बलोचिस्तान एवं खैबर पख्तूनख्वा प्रान्तों के लोगों में असंतोष उभरना स्वाभाविक था।बलोचिस्तान वैसे भी पाकिस्तान निर्माण के समय पाकिस्तान का हिस्सा न होकर एक स्वतंत्र देश था जिस पट जिन्नाह ने ब्लोचों को धोखे में रखकर 1948 में जबरन कब्जा कर लिया था।बलोच कौम तभी से बलोचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रही है।वर्ष 2016 में 15 अगस्त को लाल किले से अपने भाषण में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के भाषण में बलूचिस्तान का जिक्र आने के बाद, बलूचिस्तान आंदोलन और ज्यादा गति पकड़ गया।इसके बाद पूरी दुनिया मे ब्लोचों के धरने प्रदर्शनों में तेजी आ गई और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी बलोच आंदोलन को तवज्जो देनी शुरू कर दी।
दुनिया भर में बलोच आंदोलनकारियों के लिए सहानुभूति बढ़ी। बलोच स्वतंत्रता आंदोलन को मिली तवज्जों ने सिन्धुदेश की आज़ादी के आंदोलन को भी आत्मबल प्रदान किया।सिन्धुदेश कि आज़ादी का आंदोलन भी पिछले 45 वर्षों से जारी है।पाकिस्तान के सिंधु प्रान्त में सिंधी भाषी लोग रहते हैं जो संस्कृति, रीति-रिवाज, इतिहास में पाकिस्तान से बिल्कुल अलग पहचान रखते हैं। सिंध प्रांत के लोग स्वयं को अलग राष्ट्रीयता का मानते हैं और 1972 से ही अलग सिंधुदेश की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं।हाल ही के वर्षों में अलग सिन्धुदेश की मांग का आंदोलन पहले से कहीं ज्यादा जोर पकड़ गया है।सोशल मीडिया एवं पारंपरिक मीडिया के द्वारा भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन के प्रति सहानुभति उत्पन्न हुई है।क्योंकि इन मीडिया माध्यमों ने सिंध प्रांत में पाकिस्तानी पंजाबी सत्ताधीशों द्वारा हो रहे मानवाधिकारों के हनन को दुनिया के सामने प्रभावी तरीके से उद्घाटित किया है।
सिंधुदेश का आंदोलन नेतृत्व अल्ताफ हुसैन की लीडरशिप में मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट एवं सिंध कौमी महाज द्वारा किया जा रहा है।पाकिस्तानी सेना पूरी ताकत के साथ इस आंदोलन को कुचलने में लगी है इसीकारण आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार अल्ताफ हुसैन पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में निर्वासन में रह रहे हैं।
सिंध के स्वतंत्रता सेनानी "जिये सिंध" यानी सिंध जिंदाबाद का नारा अपने संघर्ष के लिए प्रयोग करते हैं। ये नारा है आजाद सिंधुदेश के आंदोलन का। पाकिस्तान ने इस आंदोलन को जुल्म और संगीनों के साए तले दबा कर दुनिया से छुपाए रखा था। कई बार अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाईं गईं और दुनिया को पता तक नहीं चला। लेकिन अब वैश्विक परिस्थितियां बदल गई है।गत वर्ष प्रदर्शनकारियों ने मीरपुर खास की सड़क पर आजादी का मार्च भी निकाला। जिये सिंध कौमी महाज के आंदोलनकारी सिंधी बोलने वाले पाकिस्तान के इलाके की आजादी की मांग कर रहे थे।
सिंध का स्वतंत्रता का आंदोलन इतना मजबूत है कि सिंधुदेश का राष्ट्रगान तक बनाया जा चुका है। सिंधुदेश का झंडा तक तय किया जा चुका है, जो लाल रंग का है, बीच में एक सफेद गोले में काले रंग में फरसा लिए हुए एक हाथ है। इस झंडे के तले लंबे वक्त से आजादी की मांग कर रहे आंदोलनकारियों की मांग है कि पाकिस्तान सिंध में जनमत संग्रह कराए ताकि सिंध की जनता आत्मनिर्णय करके अपनी आजादी का फैसला कर सके। लेकिन कश्मीर में जनमत संग्रह का राग अलापने वाला पाकिस्तान, सख्ती से इस मांग को दबा देता है। अक्सर निहत्थे आंदोलनकारियों की भीड़ पर गोलियां और तोपें तक चलाई जाती हैं । जिये सिंध कौमी महाज के समर्थक अपने उपाध्यक्ष केहर अंसारी की सलामती की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे, लेकिन पाकिस्तानी फौज ने उनपर भी बर्बरतापूर्वक गोलियां चलवा दीं।
1970 में जब पाश्चिमी पाकिस्तान के सिंधी-भाषी जी एम सैयद ने बांग्लाभाषियों पर हो रहे जुल्म का विरोध किया तो पाकिस्तान सरकार ने उन्हें माफ नहीं किया और नजरबंद कर दिया। मौत तक वो बिना मुकद्दमे के हिरासत में ही रहे, मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उन्हें 'अंतरात्मा का कैदी' नाम दिया। इस कैदी की आत्मा इतनी आजाद थी कि जी एम सैयद ने 1972 में अलग सिंधुदेश का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही पाकिस्तान में 45 साल से अलग सिंधुदेश का आंदोलन जारी है।
सिंधीभाषी चाहते हैं भारत, आज़ादी के उनके संघर्ष में मदद के लिए आगे आए। सांस्कृतिक रूप से भी सिंधीभाषी भारत से अपना आत्मीय एवं भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते हैं। अब ऐसे वीडियो भी बन चुके हैं जिसमें भारतीय संस्कृति के साथ पुराने रिश्ते को दोबारा अपनाने और मजबूत करने के सपने तक साकार किए जाते हैं।
भारत पाकिस्तान की और आज़ादी के बाद से ही एक छद्म युध्द झेल रहा है।हमने हमेशा रक्षात्मक रुख अपनाया और अभी तक हजारों की संख्या में हमारे सैनिक एवं नागरिक इस लडाई में जान गंवा चुके है।अभ भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की आक्रामक सुरक्षा की रणनीति पर विचार करना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की रणनीति इस संदर्भ में कारगर सिद्ध हो सकती है।कश्मीर में पाकिस्तान की किसी भी हरकत की प्रतिक्रिया सिंध में होनी चाहिए।सिंध दूसरा बांग्लादेश बन सकता है जो भौगोलिक, राजनीतिक रूप से सम्भव है।बलोचिस्तान के विपरीत सिंध भारत की सीमा से सटा हुआ है अतः उसके संघर्ष में मानवीय आधार पर सैन्य सहायता प्रदान करना काफी सुगम है।सिंध के स्वतंत्रता आंदोलन को कश्मीर में पाकिस्तान द्वारा आतंकी सहायता के विपरीत दुनिया भी नैतिक समर्थन दे सकती है।भले ही बलोचिस्तान का स्वतंत्रता संघर्ष सिंध के आंदोलन से पुराना हो लेकिन बलोचिस्तान की स्वतंत्रता का महामार्ग कराची से ही होकर गुजरता है।