शनिवार, 23 सितंबर 2017

ब्लूचिस्तान में हिन्दू

इस्लामाबाद, मई 20 : बंटवारे से पहले पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की आर्थिक समृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला हिंदू समुदाय आज अशांत हो चुके क्षेत्र में खतरनाक परिस्थितियों में जीने की विवशता के साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। स्थानीय इतिहासकारों के मुताबिक इस इलाके में हिंदू बौद्ध मतावलंबियों के समय से ही रह रहे हैं।
पाकिस्तान के मशहूर स्तंभकार मोहम्मद अकबर नोतेजाई का कहना है कि अरबों के 712 ई में आक्रमण करने से पूर्व हिंदू बलूचिस्तान पर शासन करते थे।
अपने लेख 'बलूचिस्तानी हिंदुओं का संकट' में नोतेजाई ने लिखा है, "हिंदुओं को नीची जाति का माना जाता है। उनके साथ गैर बराबरी का बर्ताव किया जाता है और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। वे पृथक क्षेत्रों में अलग-थलग रह रहे हैं। उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। उनके बच्चों की शिक्षा की स्थिति अत्यंत दयनीय है।"
बलूचिस्तान में हिंदुओं के दो पवित्र धार्मिक स्थल हैं। लासबेला जिले में हिंगलाज तीर्थ और कलात कस्बे में काली देवी का मंदिर।
बंटवारे के दौरान पूरा उपमहाद्वीप सांप्रदायिक दंगों की चपेट में आ गया था, लेकिन बलूचिस्तान रियासत में हिंदू सौहाद्र्रतापूर्वक और शांतिपूर्वक रहे। यह इलाका कलात जागीर यार मोहम्मद खान के शासन में था।
स्थानीय शासक खान हिंदुओं की स्थानीयता का सम्मान करते थे और उन्हें आर्थिक और धार्मिक आजादी दे रखी थी। यही कारण था कि हिंदुओं ने विभाजन के समय बलूचिस्तान छोड़ना मुनासिब नहीं समझा।
हिंदू बलूचों और पश्तूनों के साथ सौहार्द्रतापूर्वक रहते थे फिर भी कई हिंदू परिवार बलूचिस्तान के पश्तून इलाके को छोड़ कर बलूचों के असर वाले इलाके में चले आए या फिर बंटवारे के बाद भारत चले गए। 1941 में बलूचिस्तान के पश्तून पट्टी में हिंदुओं की आबादी 54000 थी जिसमें 1947 के बाद 93 प्रतिशत कमी आई।
महशूर हिंदू बुद्धिजीवी शाम कुमार का हवाला देते हुए नोतेजाई लिखते हैं कि हिंदू अब बलूच रिहायशी इलाकों में बदतर स्थितियों का सामना कर रहे हैं।
इसका कारण यह है कि हिंदुओं के प्रति सम्मान का भाव रखने वाले बलूच अब इस दुनिया में नहीं रहे या फिर वे अत्यंत बुजुर्ग हो चले हैं।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

तिब्बत:फैक्ट्स

भारत-चीन युद्ध

भारत-चीन युद्ध जो भारत चीन सीमा विवाद के रूप में भी जाना जाता है, चीन और भारत के बीच 1962 में हुआ एक युद्ध था। विवादित हिमालय सीमा युद्ध के लिए एक मुख्य बहाना था, लेकिन अन्य मुद्दों ने भी भूमिका निभाई।चीन में 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद जब भारत ने दलाई लामा को शरण दी तो भारत चीन सीमा पर हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू हो गयी। भारत ने फॉरवर्ड नीति के तहत मैकमोहन रेखा से लगी सीमा पर अपनी सैनिक चौकियाँ रखी जो 1959 में चीनी प्रीमियर झोउ एनलाई के द्वारा घोषित वास्तविक नियंत्रण रेखा के पूर्वी भाग के उत्तर में थी।

चीनी सेना ने 20 अक्टूबर 1962 को लद्दाख में और मैकमोहन रेखा के पार एक साथ हमले शुरू किये। चीनी सेना दोनों मोर्चे में भारतीय बलों पर उन्नत साबित हुई और पश्चिमी क्षेत्र में चुशूल में रेजांग-ला एवं पूर्व में तवांग पर अवैध कब्ज़ा कर लिया। चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी और साथ ही विवादित दो क्षेत्रों में से एक से अपनी वापसी की घोषणा भी की, हलाकिं अक्साई चिन से भारतीय पोस्ट और गश्ती दल हटा दिए गए थे, जो संघर्ष के अंत के बाद प्रत्यक्ष रुप से चीनी नियंत्रण में चला गया।

भारत-चीन युद्ध कठोर परिस्थितियों में हुई लड़ाई के लिए उल्लेखनीय है। इस युद्ध में ज्यादातर लड़ाई 4250 मीटर (14,000 फीट) से अधिक ऊंचाई पर लड़ी गयी। इस प्रकार की परिस्थिति ने दोनों पक्षों के लिए रसद और अन्य लोजिस्टिक समस्याएँ प्रस्तुत की। इस युद्ध में चीनी और भारतीय दोनों पक्ष द्वारा नौसेना या वायु सेना का उपयोग नहीं किया गया था।

चीन और भारत के बीच एक लंबी सीमा है जो नेपाल और भूटान के द्वारा तीन अनुभागो में फैला हुआ है। यह सीमा हिमालय पर्वतों से लगी हुई है जो बर्मा एवं तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान (आधुनिक पाकिस्तान) तक फैली है। इस सीमा पर कई विवादित क्षेत्र अवस्थित हैं। पश्चिमी छोर में अक्साई चिन क्षेत्र है जो स्विट्जरलैंड के आकार का है। यह क्षेत्र चीनी स्वायत्त क्षेत्र झिंजियांग और तिब्बत (जिसे चीन ने 1965 में एक स्वायत्त क्षेत्र घोषित किया) के बीच स्थित है। पूर्वी सीमा पर बर्मा और भूटान के बीच वर्तमान भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश (पुराना

तिब्बत: इतिहास से वर्तमान का चिंतन


तिब्बत:इतिहास से वर्तमान का चिंतन                              @सुनील सत्यम

भारत चीन संबंधों में चीन पर माओ के कब्जे के बाद से ही अविश्वास हावी रहा है।देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा नैतिकता और आदर्शों को महत्ता प्रदान की जिसके परिणाम हाल ही तक देश भुगतने को अभिशप्त है।नेहरू जी की समस्या यह थी कि "वह साम्यवाद से प्रभावित भी थे,उसे आजमाना भी चाहते थे लेकिन उसे लेकर हमेशा सशंकित भी थे"स्टालिन उनके मित्र थे तो माओ पर भी उंन्हे भरोसा था लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन में भारत के साम्यवादियों के रवैये ने उन्हें साम्यवाद पर शंकात्मक रुख भी अपनाने को प्रेरित किया।लेकिन ऐसी शंका यदि उन्होंने विदेशी साम्यवाद पर भी की होती तो आज परिस्थितियां कुछ और ही होती. वर्ष 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद के अगले वर्ष, भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किये। इस तरह भारत चीन लोक गणराज्य को मान्यता देने वाला प्रथम गैर-साम्यवादी देश बना।जबकि चीन में भारत के तत्कालीन राजदूत के एम पणिक्कर साम्यवाद के धुर विरोधी थे।इतना ही नहीं नेहरू जी ने चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थाई सदस्यता दिलाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा दिया।चीन ने सदस्यता इस शर्त पर हासिल की थी कि यदि चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता देनी है तो चांग काई श्येक की फारमोसा (ताइवान) सरकार को इससे बेदखल करना होगा।नेहरू जी ने फारमोसा को सदस्यता से बेदख़ल करवाने में भी चीन का पूरा साथ दिया।चीन भारत से रिश्तों की आड़ में हिमालय पार खुद को मजबूत करते करते हिमालय तक आ पहुंचा और नेहरू जी को भनक तक नही लगी। नेहरू और माओ ने 29 अप्रैल 1954 को ऐतिहासिक पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए .चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था.
इस समझौते की प्रस्तावना में पाँच सिद्धांत थे जो अगले कुछ वर्षों तक भारत-चीन की विदेश नीति की रीढ़ रहे. इसके बाद ही हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगे और भारत ने किसी भी सैन्य गट से खुद को अलग करते हुए ही विदेशी सम्बन्धों के निर्धारण में गुट निरपेक्ष  दृष्टिकोण अपनाया.
पंचशील समझौते के पांच मुख्य बिंदु थे जो भारत चीन संबंधों के अलावा भी वैश्विक संबंधों के लिए मौलिक तथ्य बन गए।ये पांच बिंदु थे:-
1-एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान
2-परस्पर अनाक्रमण
3-एक दूसरे के आंतरिक मामलों में   हस्तक्षेप नहीं करना
4-समान और परस्पर लाभकारी संबंध
5-शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
इस समझौते को लेकर 31 दिसंबर 1953 और 29 अप्रैल 1954 को महत्वपूर्ण बैठकें हुई, जिसके बाद अंततः बीजिंग में इसे अंतिम रूप दिया गया।
पंचशील शब्द, बौद्ध साहित्य से लिया गया है जो बौद्ध धर्म में गृह साधकों के लिए एक प्रकार की आचरण नियमावली का अंग है।वैसे बौद्ध धर्म मे दस शील शामिल है जो मुख्यतः ब बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करते हैं।
    पंचशील समझौते का सबसे अदूरदर्शी पहलू था भारत द्वारा तिब्बत से आने समस्त विशेषाधिकारों को त्याग कर इस पर चीनी संप्रभुता को मान्यता प्रदान कर देना। दरअसल, भारत को 1904 की आंग्ल-तिब्बत संधि से तिब्बत के संबंध कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हुए थे। पंचशील समझौते के अनुसार भारत उन  समस्त विशेषाधिकारों का परित्याग कर दिया।असल में पंचशील समझौते से भारत ने पाया कुछ भी नही और गंवाया बहुत कुछ।यहां तक कि इस समझौते से भारत ने एक बफर राज्य की समाप्ति पर हस्ताक्षर करके,भावी आक्रमण को न्यौता दे दिया।पंचशील समझौता भारत के लिए एक बेहतर अवसर हो सकता था जिसका "भावुकता" के कारण नेहरू लाभ नही उठा पाए।भारत चीन के मध्य समस्त विवाद इस समझौते पर आहति के रूप में डाले जा सकते थे।इतना ही नही समझौता करके भारतीय नेतृत्व लापरवाही की चादर तानकर चैन की नींद सो गया।
वास्तव में समझौते के पांचों बिंदुओं से चीन को लेना देना नही था वरन इस समझौते को आकर्षण प्रदान करके उसने भारत से वह हासिल कर लिए जो समझौते के पीछे उसका "गुप्त प्रयोजन' था। यह बात सिद्ध होने में ज्यादा समय नही लगा। समझौते के मात्र 87 वर्षों बाद भारत पर चीन के आक्रमण ने चीन की नीति और नीयत के खोखलेपन को दुनिया के सामने उजागर कर दिया।

विश्वास के बदले सीमा पर घात...
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      बहाना जो भी रहा हो,चीन ने भारत पर आक्रमण करके स्वयं ही पंचशील समझौते को नष्ट कर दिया था।अनाक्रमण- इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू था।लेकिन चीन ने न केवल आक्रमण किया बल्कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व एवं एक दूसरे की संप्रभुता के सम्मान करने के सिद्धान्त का उल्लंघन किया।इस प्रकार यदि तार्किक रूप से देखा जाए तो यह समझौता 1962 में भारत पर चीन के आक्रमण के दिन से ही अस्तित्व में नही है लेकिन भारतीय नेतृत्व अभी भी इससे चिपका हुआ है जिसका समय समय पर रणनीतिक लाभ लेने से चीन आज भी बाज नही आता है।चीन आज भी अरुणाचल प्रदेश को न केवल विवादित क्षेत्र मानता है वरन उस पर अपना दावा भी करता है।कश्मीर में अक्साई-चिन के क्षेत्र पर उसका अवैध कब्जा है ही।हाल ही में डोकलाम में भी चीन ने पुनः अपने साम्राज्यवादी इरादे जाहिर कर दिए।
   समय आ गया है कि भारत 1962 के आक्रमण का हवाला देते हुए 1954 के पंचशील समझौते को खंडित करार देकर तिब्बत पर अपना रुख साफ करें और घोषणा करें कि तिब्बत पर चीन की एकतरफा अधिकारिता नही है और तिब्बत एक विवादित क्षेत्र है।एक अडिग, स्थिर एवं दूरदर्शी विदेश नीति को अपनाते हुए ही भारत चीन से को सम्मानजनक प्राप्ति कर सकता है।डोकलाम विवाद इसका ताजा उदाहरण है।सिक्यांग प्रांत में चीन द्वारा मानवाधिकार हनन के मुद्दे का भी चीन के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों में लाभ लेने के लिए करना चाहिए।चीन भारत की जिस प्रकार चारों और से सामरिक घेराबंदी कर रहा है।उसी प्रकार भारत को भी वियतनाम,ताइवान,मंगोलिया,दक्षिण कोरिया,आदि देशों के साथ संबंधों को आर्थिक के साथ साथ सामरिक रुप प्रदान करना चाहिए,हालांकि भारत इस दिशा में काफी आगे बढ़ा है,लेकिन इस दिशा में और अधिक प्रयास करने जरूरी है।
तिब्बत को लेकर भारत की विदेश नीति में एक द्विधारा है जिसे केवल मोदी सरकार ही परिवर्तित कर सकती है क्योंकि विदेश नीति को लेकर देश के वर्त प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी स्पष्ट है उतना कोई नही रहा।तिब्बत द्विधारा यह है कि 1954 के पंचशील समझौते के बाद भारत ने तिब्बत पर अपने विशेषाधिकार त्यागते हुए चीनी प्रभुत्व को मान्यता दे दी। बाद में हमने 1959 के तिब्बत विद्रोह के बाद तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दी।1962 में चीन द्वारा पंचशील समझौता तोड़ते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया और भारत के एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर लिया लेकिन हमने पंचशील समझौता को अमान्य नही किया।ऐसे में हम तिब्बत को लेकर द्विधारात्मक रवैया अपनाए हुए है जिसके कारण भारत-चीन संबंधों में भारत दबाव के कारकों का लाभ नही उठा पा रहा है।हमे इस विषय मे एकल प्रवाही होना पड़ेगा।या तो हमे पंचशील को 1962 में खंडित घोषित करके अमान्य करना चाहिए अथवा तिब्बत शरणार्थी विषय पर पुनर्विचार करना चाहिए।मैक्लोडगंज में तिब्बत के8 निर्वासित सरकार भारत चीन संबंधों में उस दशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है जब हम 1954 के समझौते को अमान्य करके चीन के साथ द्विपक्षीय संबंध निर्धारण करने वाला कोई नया समझौता करें जिसमें चीन के साथ, तिब्बत को लेकर भारत एवं तिब्बत के हित में एक सकारात्मक सौदेबाजी की जा सके।

इतिहास:अयोध्या में हथछोया

इतिहास: अयोध्या में हथछोया
                           @सुनील सत्यम
बहुत छोटी उम्र से ही संजय सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। सन 1983 में संजय सिंह ने डी ए वी इंटर कालेज ऊन में पढ़ने के लिए 1984 में प्रवेश लिया और ऊन में ही रहने लगे, वह मास्टर श्री सत्यदेव शर्मा जी, जो इस स्कूल में जीवविज्ञान पढ़ाते थे, के संपर्क में आए, जो संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। संजय सिंह, सत्यदेव शर्मा जी के घर पर रहकर ही पढ़ाई करने लगे।
 1975 में आपातकाल के दौर में हथछोया के फूलसिंह दिलावरे सहारनपुर के प्रतिष्ठित संघ नेता सेठ गंगा प्रसाद माहेश्वरी के संपर्क में आये थे जो कि गिरफ्तारी से बचने के लिए फूल सिंह दिलावरे के पास खेत मे ठहरते थे। इसलिए संघ से पूर्व परिचित संजय सिंह  उन में रहकर संघ में अधिक सक्रिय होकर राष्ट्रकार्य में लग गए।मुझे याद है उस समय आज के बड़े कथावाचक एवं संत श्री विजय कौशल महाराज जी मुजफ्फरनगर जिले के जिला प्रचारक एवं श्री लक्ष्मण जी सहजिला प्रचारक थे। दोनों का ही मेरे घर पर खूब आना जाना होता था। दोनों ही लोग राजदूत मोटर-साइकल से आते थे। उन दिनों हमारा दिन में अक्सर खेत में ही रहना होता था। यह बात संघ से जुड़े हर कार्यकर्ता को पता थी इसलिए जो भी हमसे मिलने आता था, सीधे हमारे खेत में जाता था। खेत में हर मौसम में कोई न कोई फल भी खाने को मिल जाता था। उस समय हमारे खेत में आम, अमरूद, आड़ू, लोकाट, पपीता, चीकू, लीची, अंगूर, शरीफा, बेर, फूलम, शहतूत, जामुन, जमोया, आदि के पेड़ लगे हुए थे। गन्ना तो उपलब्ध रहता ही था। अतः इस कारण अथितियों का खूब सत्कार करने की सामाग्री खेत में ही उपलब्ध रहती थी।
   संत विजय कौशल जी महाराज (तत्कालीन विजय जी ) के कार्यकाल में सन 1985 में बड़ौत से संजय सिंह तोमर ने संघ शिक्षा वर्ग (ओटीसी) प्रथम वर्ष किया और वह संघ के इस क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में पहले प्रशिक्षित कार्यकर्ता बन गए।सन 1985 में ऊन से दसवीं तथा 1988 राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज झिंझना से 12 वीं की परीक्षा पास कर संजय सिंह तोमर 1989 में बी.एससी. करने के लिए डीएवी कालेज मुजफ्फरनगर, चले गए। यहाँ छात्रावास में रहकर उन्होंने अध्ययन किया। अपने समय में वह डीएवी कालेज मुजफ्फरनगर के जाने-माने छात्रनेता थे। यहाँ उन्होने “शुभम छात्र संगठन” की स्थापना की और अनेक मुद्दो को लेकर छात्र हितों के लिए संघर्ष किया।यह समय किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकेत के उत्थान का समय था। पूरे देश में किसानों के राष्ट्रीय नेता के रूप में टिकेत प्रसिद्धि पा रहे थे। संजय सिंह द्वारा छात्र हितों के लिए किए जा रहे संघर्ष के बारे मे सुनकर चौधरी साहब स्वयं उनसे मिलने छात्रावास पहुंचे और उन्हे अपना आशीर्वाद दिया था। इसी समय तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद और विधायक सोमांश प्रकाश भी उनसे मिलने छात्रावास आए थे।
यहाँ टिकेत साहब के साथ बड़े भाई की फोटो लगाए।
चौधरी महेंद्र सिंह टिकेत के साथ डीएवी छात्रावास मुजफ्फरनगर मे तत्कालीन छात्रनेता संजय सिंह

 बी.एससी. के दौरान ही 1992 में संजय सिंह का लेखपाल (पटवारी) के पद पर चयन हो गया और अपनी पढ़ाई को बीच में छोड़कर ही उन्होने नौकरी ज्वाइन कर ली। प्रशिक्षण के बाद लेखपाल के रूप में 4 अप्रैल 1994 को तत्कालीन बुढाना तहसील के गंगेरू गाँव का कार्यभार संभाला। जब वह संघ के संपर्क में आए, उस समय मै कक्षा तीन में था। हम संघ शाखा में जाते थे, प्रार्थना करते थे लेकिन शिशु होने के कारण खेलने का मौका नहीं मिलता था, क्योंकि खेलने वाले सभी स्वयंसेवक तरुणावस्था के होते थे। मेरी उम्र के कई साथी भी उसी समय संघ शाखा में जाते थे जिनमे रवीन्द्र (मेहर सिंह दिलावरे), मनीष (राजेश लाला), ललित (लाला जगदीश प्रसाद), अश्वनी (जगरोशन मास्टर जी) जगपाल(कल्लन), राजबीर, आदि प्रमुख थे। मैंने शीघ्र ही रास्ता निकाल लिया। मनीष की मम्मी से भगवा रंग का एक छोटे आकार का ध्वज तैयार करवाया और अपनी अलग शिशु शाखा लगानी शुरू कर दी। शाखा लगाने की प्रणाली हमने शाखा मे जाकर सीख ही ली थी जो हमारे काम आई।कक्षा तीन से मैने संघ शाखा में जाना शुरू कर दिया था लेकिन मैंने कभी संघ की शाखा या किसी शिविर एवं अन्य कार्यक्रम में कभी राष्ट्रप्रेम के अलावा मुस्लिम,ईसाई या अन्य किसी पंथ के विरोध या उनके खिलाफ दुष्प्रचार की कभी कोई बात नहीं सुनी। अक्सर संघ को न जानने वाले लोग संघ के बारे मे ऐसा दुष्प्रचार करते है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि हकीकत में संघ किसी का विरोधी न होकर एक राष्ट्रप्रेमी संगठन मात्र है, जैसा कि मैंने पाया। सन 1984 मे प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी की आतंकियों द्वारा जघन्य हत्या कर दी गई जिसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री राजीव गांधी जी देश के प्रधानमंत्री बने। इसी समय सन 1985 में हरिद्वार मे विश्व हिन्दू परिषद ने भल्ला इंटर कालेज में “विराट हिन्दू सम्मेलन “ का आयोजन करके “रामजन्म भूमि अयोध्या की मुक्ति के लिए आंदोलन शुरू करने का एलान कर दिया। इसी क्रम में 1986 में रामजन्म भूमि का ताला खुलवाने के लिए देश भर मे आंदोलन शुरू हो गया। देश भर में इस विषय पर जन जागरण फैलाने के लिए “राम जानकी रथ यात्रा” का आयोजन किया गया। हथछोया में भी सड़क पर ही रईये में “राम जानकी रथ” का स्वागत किया गया। इसके बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने रामजन्म भूमि का ताला खोलने के आदेश दे दिये। अब विश्व हिन्दू परिषद और अन्य हिन्दू संघठनो ने रामजन्म भूमि अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर बनाने के लिए आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी । अयोध्या से चलकर देश भर में रामशिला पूजन का कार्यक्रम रखा गया। हथछोया मे भी सन 1989 मे रामशिला का बैंड बजे के साथ पूजन किया गया। 30 अक्तूबर 1990 को विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा के प्रारम्भ की घोषणा कर दी। पूरे देश मे तनाव का माहौल था। कुछ शरारती तत्वों ने गाँव का भी महोल खराब करने का प्रयास किया लेकिन हमारे प्रयासों के आगे उनकी कोसिशे बेकार सिद्द हुई। गाँव मे शांति बहाल रही। अयोध्या मे कारसेवकों पर गोली चला दी गई जिसमे कई कारसेवक शहीद हो गए जिनमे मे कोठारी बंधुओं का बलिदान विशेष चर्चा का विषय बना। पुनः 6 दिसंबर 1992 को कारसेवा की तैयारी विश्व हिन्दू परिषद ने शुरू कर दी थी। गाँव से संजय सिंह दिलावरे, उदेश शर्मा पुत्र मँगत, मांगेराम शर्मा पुत्र चमन सिंह एवं उमाशंकर पुत्र मास्टर भगवती प्रसाद शर्मा 30 नवंबर 1992 को कारसेवा के लिए अयोध्या के लिए रवाना हुए। 2 दिसंबर तक इन करसेवकों का जत्था लखनऊ पहुँच गया जिसे उसी दिन विधान सभी के पास गिरफ्तार करके आलम बाग जेल भेज दिया गया। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या स्थित विवादित ढांचा गिरा दिया गया। वास्तव मे करसेवकों द्वारा 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जो विवादित ढांचा गिराया गया था वह एक मंदिर ही था क्योंकि उस समय पर उस ढांचे के अंदर भगवान राम की मूर्तियाँ ही विराजमान थी। ऐसे मे उसे मस्जिद या अन्य कोई धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता है। देश के सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ने के लिए ही कुछ शरारती तत्वों ने उस विवादित ढांचे को मस्जिद के रूप में प्रचारित किया गया। 8 दिसंबर 1992 को आलम बाग जेल में कैद करके रखे गए सभी कारसेवकों को रिहा कर दिया गया। रिहा होने के बाद ये लोग सीधे अयोध्या पहुंचे जहां सरयू में स्नान एवं रामलला के दर्शन के बाद गाँव में सकुशल वापस लौट आए। इस प्रकार अयोध्या में हथछोया ने अपना प्रतिनिधित्व दर्ज कराया।
कक्षा 5 तक आते आते मेरी शाखा पूरे मेरठ क्षेत्र में प्रसिद्द हो चुकी थी। मुझ पर शाखा कार्य कि इतनी धुन सवार थी कि आँधी,बारिश तूफान कुछ भी रहा हो, मेरे साथ कोई रहा हो या न रहा हो, मैंने अकेले ही शाखा लगाकर,ध्वज-प्रणाम किया,प्रार्थना की और घर आ गया।
कक्षा 10 तक मैंने गाँव मे ही रहकर पढ़ाई की। कक्षा 10 की परीक्षा के दौरान लगभग एक महीने मै ऊन मे खुशीराम जी के घेर वाले मकान में रहा । यहाँ मैंने और उनके छोटे बेटे अनिल ने कक्षा 10 की परिक्षा सन 1992 मे एक साथ दी। हमारा परीक्षा केंद्र झिंझना के राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज मे था।हम सुबह 4 बजे तांगे मे बैठकर झिंझना जाते और परीक्षा मे शामिल होते। मैंने प्रथम श्रेणी के साथ यह परीक्षा पास की।
कक्षा 10 पास करने तक मैंने गाँव में खूब सामाजिक कार्य किया। हम लगभग हर महीने सह-भोज का कार्यक्रम रखते थे जिसमे शाखा पर आने वाले सभी स्वयंसेवकों के घर से खाना मंगाया जाता था। इस खाने को एक बड़े बर्तन मे मिलाकर रखा जाता और फिर पंगत में बैठकर सभी सहभागियों को भोजन मंत्र के बाद भोजन कराया जाता था। भोजन सभी जातियों के स्वयसेवकों के घर से आता था। अतः जब उस समस्त भोजन को एक जगह मिलकर सभी को खिलाया जाता था तो इससे सामाजिक समरसता का स्वाभाविक अहसास होता था। ये ऐसी घटनाएँ थी जिनहोने मेरे स्वभाव,चरित्र और सोच को अत्यधिक प्रभावित किया। मैंने कभी जाति-गौत्र सूचक शब्द का अपने नाम के साथ प्रयोग नहीं किया। जातीय भावनाएं कभी मेरे चरित्र का हिस्सा नहीं बन पाई।
बड़े भाई दसवीं कक्षा से ही गाँव से ऊन चले गए थे। राममंदिर आंदोलन के सक्रिय सहभागी रहे मेरे बड़े भाई संजय सिंह दिलावरे। सन 1986 मे रामजानकी रथ यात्रा से लेकर 1990 मे अयोध्या मे कारसेवा तक हर कार्यक्रम में वह शामिल रहे। 1990 में अयोध्या कारसेवा में जाते समय संजय सिंह औरु उनकी मंडली को लखनऊ मे गिरफ्तार कर लिए गया, जहां ये लोग लगभग एक माह तक जेल मे बंद रहे। राम-मंदिर आंदोलन से हमारा जुड़ाव सांसकृतिक था। इसने कभी भी मेरे परिवार के मन मे कट्टरता या मुस्लिम विरोध की भावना जाग्रत नहीं होने दी। 30 अक्तूबर 1990 को लेकर पूरे भारत मे तनाव का माहौल व्याप्त था, हमारा गाँव हथछोया भी तनाव की उस बेला से अछूता नहीं था। 30 अक्तूबर 1990 को संजय सिंह लखनऊ जेल में बंद थे । मैं और मेरे पिताजी श्री प्रेम सिंह ने उस समय गाँव मे घूम-घूम कर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की । हमारे साथ इस पवित्र कार्य में अश्वनी जी , रवीन्द्र जी, आदि अन्य मित्रों ने भी साथ दिया। यह मेरे गाँव की सांझी-सांसकृतिक विरासत का ही परिणाम था कि गाँव के मुस्लिम समाज ने शांति कि रक्षा के लिए हमे पूरा सहयोग किया। यद्यपि कुछ शरारती तत्वों ने उस समय शांति भंग करने की कोशिश की थी लेकिन शांतिप्रिय हिन्दू और मुसलमानों ने उनके मंसूबों को असफल कर दिया। हम सबने ऊन दिनों रात को जागकर गलियों मे पहरा दिया और गाँव की शांति की रक्षा की।
संजय सिंह, अपने जमाने में गाँव की रामलीला के एक सुपरहिट कलाकार भी रहे है। “अमर सिंह राठौर” के चरित्र पर आधारित एक नाटक गाँव की रामलीला का हिस्सा रहा है। इस नाटक मे गरीब बाप का एक शालीन बेटा नबी-रसूल होता है, जिसका चरित्र अनेक वर्षों तक उन्होंने बड़े ही शानदार अंदाज़ में निभाया। कई वर्षों तक गाँव की रामलीला में लक्ष्मण का पाठ भी उन्होने ही ने निभाया है।
कक्षा 10 के बाद संजय झिझाना राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज में पढ़ने चले गए और वहीं किराये पर कमरा लेकर रहने लगे, उनके साथ ही मनीष पुत्र सोमदत्त शर्मा जी भी रहे। उस समय आस-पास के क्षेत्र में सिर्फ तीतरों, थानाभवन,ऊन एवं झिंझाना में ही इंटर कालेज थे । संजय भाई ने बड़ी मेहनत और लगन के साथ अपनी पढ़ाई की। 1992 में वह लेखपाल (पटवारी) के पद पर चयनित हो गए। हथछोया गाँव से लेखपाल के पद पर चयनित होने वाले, संजय सिंह तोमर पहले व्यक्ति थे। वर्ष 2017 तक इस पद पर गाँव से किसी का चयन नहीं हुआ है। विनम्रता के मामले में उनका कोई जवाब नहीं है, सहनशीलता और धैर्य उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है।