शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

इतिहास:अयोध्या में हथछोया

इतिहास: अयोध्या में हथछोया
                           @सुनील सत्यम
बहुत छोटी उम्र से ही संजय सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। सन 1983 में संजय सिंह ने डी ए वी इंटर कालेज ऊन में पढ़ने के लिए 1984 में प्रवेश लिया और ऊन में ही रहने लगे, वह मास्टर श्री सत्यदेव शर्मा जी, जो इस स्कूल में जीवविज्ञान पढ़ाते थे, के संपर्क में आए, जो संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। संजय सिंह, सत्यदेव शर्मा जी के घर पर रहकर ही पढ़ाई करने लगे।
 1975 में आपातकाल के दौर में हथछोया के फूलसिंह दिलावरे सहारनपुर के प्रतिष्ठित संघ नेता सेठ गंगा प्रसाद माहेश्वरी के संपर्क में आये थे जो कि गिरफ्तारी से बचने के लिए फूल सिंह दिलावरे के पास खेत मे ठहरते थे। इसलिए संघ से पूर्व परिचित संजय सिंह  उन में रहकर संघ में अधिक सक्रिय होकर राष्ट्रकार्य में लग गए।मुझे याद है उस समय आज के बड़े कथावाचक एवं संत श्री विजय कौशल महाराज जी मुजफ्फरनगर जिले के जिला प्रचारक एवं श्री लक्ष्मण जी सहजिला प्रचारक थे। दोनों का ही मेरे घर पर खूब आना जाना होता था। दोनों ही लोग राजदूत मोटर-साइकल से आते थे। उन दिनों हमारा दिन में अक्सर खेत में ही रहना होता था। यह बात संघ से जुड़े हर कार्यकर्ता को पता थी इसलिए जो भी हमसे मिलने आता था, सीधे हमारे खेत में जाता था। खेत में हर मौसम में कोई न कोई फल भी खाने को मिल जाता था। उस समय हमारे खेत में आम, अमरूद, आड़ू, लोकाट, पपीता, चीकू, लीची, अंगूर, शरीफा, बेर, फूलम, शहतूत, जामुन, जमोया, आदि के पेड़ लगे हुए थे। गन्ना तो उपलब्ध रहता ही था। अतः इस कारण अथितियों का खूब सत्कार करने की सामाग्री खेत में ही उपलब्ध रहती थी।
   संत विजय कौशल जी महाराज (तत्कालीन विजय जी ) के कार्यकाल में सन 1985 में बड़ौत से संजय सिंह तोमर ने संघ शिक्षा वर्ग (ओटीसी) प्रथम वर्ष किया और वह संघ के इस क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में पहले प्रशिक्षित कार्यकर्ता बन गए।सन 1985 में ऊन से दसवीं तथा 1988 राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज झिंझना से 12 वीं की परीक्षा पास कर संजय सिंह तोमर 1989 में बी.एससी. करने के लिए डीएवी कालेज मुजफ्फरनगर, चले गए। यहाँ छात्रावास में रहकर उन्होंने अध्ययन किया। अपने समय में वह डीएवी कालेज मुजफ्फरनगर के जाने-माने छात्रनेता थे। यहाँ उन्होने “शुभम छात्र संगठन” की स्थापना की और अनेक मुद्दो को लेकर छात्र हितों के लिए संघर्ष किया।यह समय किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकेत के उत्थान का समय था। पूरे देश में किसानों के राष्ट्रीय नेता के रूप में टिकेत प्रसिद्धि पा रहे थे। संजय सिंह द्वारा छात्र हितों के लिए किए जा रहे संघर्ष के बारे मे सुनकर चौधरी साहब स्वयं उनसे मिलने छात्रावास पहुंचे और उन्हे अपना आशीर्वाद दिया था। इसी समय तत्कालीन गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद और विधायक सोमांश प्रकाश भी उनसे मिलने छात्रावास आए थे।
यहाँ टिकेत साहब के साथ बड़े भाई की फोटो लगाए।
चौधरी महेंद्र सिंह टिकेत के साथ डीएवी छात्रावास मुजफ्फरनगर मे तत्कालीन छात्रनेता संजय सिंह

 बी.एससी. के दौरान ही 1992 में संजय सिंह का लेखपाल (पटवारी) के पद पर चयन हो गया और अपनी पढ़ाई को बीच में छोड़कर ही उन्होने नौकरी ज्वाइन कर ली। प्रशिक्षण के बाद लेखपाल के रूप में 4 अप्रैल 1994 को तत्कालीन बुढाना तहसील के गंगेरू गाँव का कार्यभार संभाला। जब वह संघ के संपर्क में आए, उस समय मै कक्षा तीन में था। हम संघ शाखा में जाते थे, प्रार्थना करते थे लेकिन शिशु होने के कारण खेलने का मौका नहीं मिलता था, क्योंकि खेलने वाले सभी स्वयंसेवक तरुणावस्था के होते थे। मेरी उम्र के कई साथी भी उसी समय संघ शाखा में जाते थे जिनमे रवीन्द्र (मेहर सिंह दिलावरे), मनीष (राजेश लाला), ललित (लाला जगदीश प्रसाद), अश्वनी (जगरोशन मास्टर जी) जगपाल(कल्लन), राजबीर, आदि प्रमुख थे। मैंने शीघ्र ही रास्ता निकाल लिया। मनीष की मम्मी से भगवा रंग का एक छोटे आकार का ध्वज तैयार करवाया और अपनी अलग शिशु शाखा लगानी शुरू कर दी। शाखा लगाने की प्रणाली हमने शाखा मे जाकर सीख ही ली थी जो हमारे काम आई।कक्षा तीन से मैने संघ शाखा में जाना शुरू कर दिया था लेकिन मैंने कभी संघ की शाखा या किसी शिविर एवं अन्य कार्यक्रम में कभी राष्ट्रप्रेम के अलावा मुस्लिम,ईसाई या अन्य किसी पंथ के विरोध या उनके खिलाफ दुष्प्रचार की कभी कोई बात नहीं सुनी। अक्सर संघ को न जानने वाले लोग संघ के बारे मे ऐसा दुष्प्रचार करते है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि हकीकत में संघ किसी का विरोधी न होकर एक राष्ट्रप्रेमी संगठन मात्र है, जैसा कि मैंने पाया। सन 1984 मे प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी की आतंकियों द्वारा जघन्य हत्या कर दी गई जिसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री राजीव गांधी जी देश के प्रधानमंत्री बने। इसी समय सन 1985 में हरिद्वार मे विश्व हिन्दू परिषद ने भल्ला इंटर कालेज में “विराट हिन्दू सम्मेलन “ का आयोजन करके “रामजन्म भूमि अयोध्या की मुक्ति के लिए आंदोलन शुरू करने का एलान कर दिया। इसी क्रम में 1986 में रामजन्म भूमि का ताला खुलवाने के लिए देश भर मे आंदोलन शुरू हो गया। देश भर में इस विषय पर जन जागरण फैलाने के लिए “राम जानकी रथ यात्रा” का आयोजन किया गया। हथछोया में भी सड़क पर ही रईये में “राम जानकी रथ” का स्वागत किया गया। इसके बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने रामजन्म भूमि का ताला खोलने के आदेश दे दिये। अब विश्व हिन्दू परिषद और अन्य हिन्दू संघठनो ने रामजन्म भूमि अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर बनाने के लिए आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी । अयोध्या से चलकर देश भर में रामशिला पूजन का कार्यक्रम रखा गया। हथछोया मे भी सन 1989 मे रामशिला का बैंड बजे के साथ पूजन किया गया। 30 अक्तूबर 1990 को विश्व हिन्दू परिषद ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा के प्रारम्भ की घोषणा कर दी। पूरे देश मे तनाव का माहौल था। कुछ शरारती तत्वों ने गाँव का भी महोल खराब करने का प्रयास किया लेकिन हमारे प्रयासों के आगे उनकी कोसिशे बेकार सिद्द हुई। गाँव मे शांति बहाल रही। अयोध्या मे कारसेवकों पर गोली चला दी गई जिसमे कई कारसेवक शहीद हो गए जिनमे मे कोठारी बंधुओं का बलिदान विशेष चर्चा का विषय बना। पुनः 6 दिसंबर 1992 को कारसेवा की तैयारी विश्व हिन्दू परिषद ने शुरू कर दी थी। गाँव से संजय सिंह दिलावरे, उदेश शर्मा पुत्र मँगत, मांगेराम शर्मा पुत्र चमन सिंह एवं उमाशंकर पुत्र मास्टर भगवती प्रसाद शर्मा 30 नवंबर 1992 को कारसेवा के लिए अयोध्या के लिए रवाना हुए। 2 दिसंबर तक इन करसेवकों का जत्था लखनऊ पहुँच गया जिसे उसी दिन विधान सभी के पास गिरफ्तार करके आलम बाग जेल भेज दिया गया। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या स्थित विवादित ढांचा गिरा दिया गया। वास्तव मे करसेवकों द्वारा 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जो विवादित ढांचा गिराया गया था वह एक मंदिर ही था क्योंकि उस समय पर उस ढांचे के अंदर भगवान राम की मूर्तियाँ ही विराजमान थी। ऐसे मे उसे मस्जिद या अन्य कोई धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता है। देश के सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ने के लिए ही कुछ शरारती तत्वों ने उस विवादित ढांचे को मस्जिद के रूप में प्रचारित किया गया। 8 दिसंबर 1992 को आलम बाग जेल में कैद करके रखे गए सभी कारसेवकों को रिहा कर दिया गया। रिहा होने के बाद ये लोग सीधे अयोध्या पहुंचे जहां सरयू में स्नान एवं रामलला के दर्शन के बाद गाँव में सकुशल वापस लौट आए। इस प्रकार अयोध्या में हथछोया ने अपना प्रतिनिधित्व दर्ज कराया।
कक्षा 5 तक आते आते मेरी शाखा पूरे मेरठ क्षेत्र में प्रसिद्द हो चुकी थी। मुझ पर शाखा कार्य कि इतनी धुन सवार थी कि आँधी,बारिश तूफान कुछ भी रहा हो, मेरे साथ कोई रहा हो या न रहा हो, मैंने अकेले ही शाखा लगाकर,ध्वज-प्रणाम किया,प्रार्थना की और घर आ गया।
कक्षा 10 तक मैंने गाँव मे ही रहकर पढ़ाई की। कक्षा 10 की परीक्षा के दौरान लगभग एक महीने मै ऊन मे खुशीराम जी के घेर वाले मकान में रहा । यहाँ मैंने और उनके छोटे बेटे अनिल ने कक्षा 10 की परिक्षा सन 1992 मे एक साथ दी। हमारा परीक्षा केंद्र झिंझना के राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज मे था।हम सुबह 4 बजे तांगे मे बैठकर झिंझना जाते और परीक्षा मे शामिल होते। मैंने प्रथम श्रेणी के साथ यह परीक्षा पास की।
कक्षा 10 पास करने तक मैंने गाँव में खूब सामाजिक कार्य किया। हम लगभग हर महीने सह-भोज का कार्यक्रम रखते थे जिसमे शाखा पर आने वाले सभी स्वयंसेवकों के घर से खाना मंगाया जाता था। इस खाने को एक बड़े बर्तन मे मिलाकर रखा जाता और फिर पंगत में बैठकर सभी सहभागियों को भोजन मंत्र के बाद भोजन कराया जाता था। भोजन सभी जातियों के स्वयसेवकों के घर से आता था। अतः जब उस समस्त भोजन को एक जगह मिलकर सभी को खिलाया जाता था तो इससे सामाजिक समरसता का स्वाभाविक अहसास होता था। ये ऐसी घटनाएँ थी जिनहोने मेरे स्वभाव,चरित्र और सोच को अत्यधिक प्रभावित किया। मैंने कभी जाति-गौत्र सूचक शब्द का अपने नाम के साथ प्रयोग नहीं किया। जातीय भावनाएं कभी मेरे चरित्र का हिस्सा नहीं बन पाई।
बड़े भाई दसवीं कक्षा से ही गाँव से ऊन चले गए थे। राममंदिर आंदोलन के सक्रिय सहभागी रहे मेरे बड़े भाई संजय सिंह दिलावरे। सन 1986 मे रामजानकी रथ यात्रा से लेकर 1990 मे अयोध्या मे कारसेवा तक हर कार्यक्रम में वह शामिल रहे। 1990 में अयोध्या कारसेवा में जाते समय संजय सिंह औरु उनकी मंडली को लखनऊ मे गिरफ्तार कर लिए गया, जहां ये लोग लगभग एक माह तक जेल मे बंद रहे। राम-मंदिर आंदोलन से हमारा जुड़ाव सांसकृतिक था। इसने कभी भी मेरे परिवार के मन मे कट्टरता या मुस्लिम विरोध की भावना जाग्रत नहीं होने दी। 30 अक्तूबर 1990 को लेकर पूरे भारत मे तनाव का माहौल व्याप्त था, हमारा गाँव हथछोया भी तनाव की उस बेला से अछूता नहीं था। 30 अक्तूबर 1990 को संजय सिंह लखनऊ जेल में बंद थे । मैं और मेरे पिताजी श्री प्रेम सिंह ने उस समय गाँव मे घूम-घूम कर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की । हमारे साथ इस पवित्र कार्य में अश्वनी जी , रवीन्द्र जी, आदि अन्य मित्रों ने भी साथ दिया। यह मेरे गाँव की सांझी-सांसकृतिक विरासत का ही परिणाम था कि गाँव के मुस्लिम समाज ने शांति कि रक्षा के लिए हमे पूरा सहयोग किया। यद्यपि कुछ शरारती तत्वों ने उस समय शांति भंग करने की कोशिश की थी लेकिन शांतिप्रिय हिन्दू और मुसलमानों ने उनके मंसूबों को असफल कर दिया। हम सबने ऊन दिनों रात को जागकर गलियों मे पहरा दिया और गाँव की शांति की रक्षा की।
संजय सिंह, अपने जमाने में गाँव की रामलीला के एक सुपरहिट कलाकार भी रहे है। “अमर सिंह राठौर” के चरित्र पर आधारित एक नाटक गाँव की रामलीला का हिस्सा रहा है। इस नाटक मे गरीब बाप का एक शालीन बेटा नबी-रसूल होता है, जिसका चरित्र अनेक वर्षों तक उन्होंने बड़े ही शानदार अंदाज़ में निभाया। कई वर्षों तक गाँव की रामलीला में लक्ष्मण का पाठ भी उन्होने ही ने निभाया है।
कक्षा 10 के बाद संजय झिझाना राष्ट्रीय शिक्षा सदन इंटर कालेज में पढ़ने चले गए और वहीं किराये पर कमरा लेकर रहने लगे, उनके साथ ही मनीष पुत्र सोमदत्त शर्मा जी भी रहे। उस समय आस-पास के क्षेत्र में सिर्फ तीतरों, थानाभवन,ऊन एवं झिंझाना में ही इंटर कालेज थे । संजय भाई ने बड़ी मेहनत और लगन के साथ अपनी पढ़ाई की। 1992 में वह लेखपाल (पटवारी) के पद पर चयनित हो गए। हथछोया गाँव से लेखपाल के पद पर चयनित होने वाले, संजय सिंह तोमर पहले व्यक्ति थे। वर्ष 2017 तक इस पद पर गाँव से किसी का चयन नहीं हुआ है। विनम्रता के मामले में उनका कोई जवाब नहीं है, सहनशीलता और धैर्य उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है।

रविवार, 17 सितंबर 2017

भारत मे ग्राम पंचायतों का इतिहास

            पंचायतें: इतिहास,वर्तमान, एवं सुधार की आवश्यकता-1
                           @ सुनील सत्यम
भारत में पंचायतों का इतिहास काफी पुराना है। नवीन दृष्टिकोण से देखें तो हड़प्पा काल में नागरिक शासन का प्रमुख रूप नगर-पंचायतों के रूप में ही सामने आया । केंद्रीकृत शासन की कल्पना तत्कालीन संदर्भों में तार्किक नही है। अतः हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, राखीगढ़ी, लोथल एवं धोलावीरा का नगर-पंचायतों (पालिकाओं) के रूप में ही विकास हुआ था। वैदिक साहित्य मे भी पंचायतों का सभा,समिति एवं विदथ के रूप में अस्तित्व था। सभा को “नरिष्ठा” कहा गया है अर्थात इसके निर्णय की अवहेलना नहीं की जा सकती थी। निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे। वैदिक साहित्य में ग्राम पंचायत के प्रमुख के लिए “ग्रामणी” शब्द का उल्लेख किया गया है।ऋग्वेद मे सभा और समिति को प्रजापिता की दो पौत्रियों के रूप मे महत्व दिया गया है।  पाणिनी ने भी अपनी कालजयी पुस्तक “अष्टाध्यायी” में गराजयों का विवरण दिया है।मौर्यकाल मे ग्राम एवं नगर-पंचायत के गठन एवं कार्यों का विशद विवरण मिलता है। ग्राम पंचायत का प्रमुख ग्राम-भोजक कहलाता था जिसका कार्य अभियोगों का निर्णयन, जुआँ तथा मध्य निषेद एवं पशु हिंसा पर रोक लगाना आदि था। मेगास्थनीज ने पाटलिपुत्र की नगर व्यवस्था का रोचक विवरण मिलता है जिसका संचालन 30 सदस्यों से निर्मित 6 प्रमुख समितियों द्वारा किया जाता था। इनमे से एक समिति का कार्य जनगणना करने का था जो आज के संदर्भ मे अत्यंत महत्वपूर्ण है।चाणक्य ने अर्थशास्त्र में पंचायत व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। चौरोद्धर्णिक मौर्यकाल का एक ग्राम स्तर का अधिकारी था जिससे चौधरी शब्द की उत्पत्ति हुई। इसका कार्य ग्राम मे चौरों का पता लगाकर समस्या का निवारण करना था। पालि साहित्य में भी समितियों का वृहद उल्लेख मिलता है। समितियों का चुनाव नागरिकों के मध्य से किया जाता था। समितियों की कार्यपददती का स्पष्ट विवरण बौद्ध साहित्य में मिलता है।  विदथ की बैठकों मे महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। गुप्तकाल मे भी पंचायतें कई रूपों में अस्तित्वमान रही जैसे श्रेणियाँ। व्यवस्थित रूप में पंचायतों का विकास चोल काल में हुआ। चोल काल में पंचायतें समितियों के रूप में कार्य करती थी।  चोलकालीन प्रसिद्द उत्तरमेरुर लेख से चोलकालीन पंचायत व्यवस्था का व्यापक विवरण मिलता है। चोल काल में स्थानीय स्वशासन का जो विकास हुआ वैसा दुनिया के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिला है। चोलकाल में ग्राम स्वशासन की पूर्ण इकाई थे, ग्रामवासी अपने मध्य से लोकतान्त्रिक तरीके से चुने सदस्यों के माध्यम से ग्राम का प्रशासन स्वयं संचालित करते थे। चोल शासकों के विभिन्न अभिलेखों से इस व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश पड़ता है।
उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार ग्राम को प्रशासनिक दृष्टि से कई भागों में विभाजित कर दिया जाता था।जैसे उपवन,सिंचाई, आदि। निर्धारित योग्यता रखने वाले एक व्यक्ति को ही किसी समिति के लिए सदस्य चुना जाता था। समिति का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यता आवश्यक थी- (1) सदस्य संबन्धित ग्राम का मूलनिवासी हो। (2) उसकी आयु 35 और 70 वर्ष के बीच हो। (3) एक-चौथाई वेलि (लगभग डेढ़ एकड़) से अधिक भूमि का स्वामी हो। (4) वह स्वयं की भूमि पर बनाये मकान में रहता हो। (5) वेदत्रयी का ज्ञाता हो, वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों का सम्यक ज्ञान रखता हो।कोई व्यक्ति का सदस्य नही चुना जा सकता था यदि वह:
1.  पिछले तीन वर्षों से किसी समिति का सदस्य रहा हो।
2.  उसने सदस्य के रूप में आय-व्यय का लेखा-जोखा अपने विभाग को न दिया हो।
3.  भयंकर अपराधों में लिप्त रहा हो।
इस प्रकार निर्वाचन हेतु सभी शर्तें पूरी करने वाले व्यक्ति का लॉटरी प्रणाली से चयन किया जाता था। उम्मीदवार सदस्यों के नाम ताडपत्र पर लिखकर एक घड़े डाल दिये जाते थे जिनमे से किसी बालक द्वारा निकाले हुए पर्चे के आधार पर सदस्य का चुनाव हो जाता था।  इन सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष था। इन सदस्यों में 12 स्थायी समिति के, 12 उपवन समिति के और 7 तालाब समिति के लिए चुने जाते थे। समिति को वारियम कहते थे और यह ग्राम सभा के कार्यों का संचालन करती थी। ग्राम सभा के कार्यों के लिए कई समितियां होती थीं।
ग्राम सभा के अनेक कार्य थे। यह भूमिकर एकत्र करके सरकारी खजाने में जमा करती थी। तालाबों और सिंचाई के साधनों का प्रबन्ध करती थी। ग्राम के मन्दिरों और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल, ग्रामवासियों के मुकदमों का फैसला करना, ग्राम की सड़कों को बनवाना, ग्राम में औषधालय खोलना, ग्राम के बाजारों और पेठों का प्रबन्ध करना, इत्यादि ग्राम सभा के कार्य थे।
ग्राम सभा की बैठक मन्दिर अथवा किसी बड़े वृक्ष के नीचे होती थी। राज्य ग्राम पंचायतों के मामलों हस्तक्षेप नहीं करता था। स्पष्ट है कि ग्राम स्थानीय स्वशासन की एक मूल इकाई था।
व्यापारियों से संबंधित हितों की देखभाल हेतु-मणिग्रामम्, वलंजियार, नानादेशी जैसे समूह थे। धार्मिक हित समूहों में मूलपेरूदियार था। यह मंदिरों की व्यवस्था की निगरानी करता था। संपूर्ण साम्राज्य मंडलों (प्रान्तों) में बंटा हुआ था। प्रान्तों का विभाजन वलनाडु या नाडु में होता था। उसके नीचे गांव का समूह कुर्रम या कोट्टम कहलाता था। सबसे नीचे गांव था। ग्राम की स्थिति पट्टे के अनुसार भिन्न प्रकार की होती थी। गांवों की तीन श्रेणियाँ थीं- ऐसे ग्राम सबसे ज्यादा होते थे जिनमें अंतर्जातीय आबादी होती थी एवं जो भू-राजस्व थे। सबसे कम संख्या में ऐसे ग्राम होते थे जो ब्रह्मदेय कहलाते थे एवं इनमें पूरा ग्राम या ग्राम की भूमि किसी एक ब्राह्मण समूह को दी गई होती थी। ब्रह्मदेय से संबंधित अग्रहार अनुदान होता था जिसमें ग्राम ब्राह्मण बस्ती होता था एवं भूमि अनुदान में दी गई होती थी। ये भी कर मुक्त थे, किन्तु ब्राह्मण अपनी इच्छा से नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था कर सकते थे।



शनिवार, 16 सितंबर 2017

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण



हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण
                                                                            @सुनील सत्यम
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वरन एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों में पहुँचता था । वास्तव में ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
*1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
*2- दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--
दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने के लिए नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों में हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी फसल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने में बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुताई करने में सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा में अधिशेष अन्न उत्पादन करने में सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुव्यवस्थित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व में आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप में अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा में राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य की संप्रभुता की सीमा में नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों की भी सीमा थी,इन्ही नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, ग्रामीण जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। इससे यह निष्कर्ष निकालना तार्किक एवं उचित रहेगा कि हड़प्पा कि राजसत्ता सबसे पहले नगर-पालिकाओं के रूप मे विकसित हुए।हड़प्पा, मोहंजोदड़ों, धोलावीरा,राखीगढ़ी ,लोथल आदि इस सभ्यता कि प्रतिनिधि नगर-पालिकाएं थी। यह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि इन सभी नगर-पालिकाओं मे समान नागरिक सुविधाओं जैसे सुनियोजित नगरीकरण, चौड़ी सड़के, व्यवस्थित जल निकासी आदि एक समान प्रतिरूप मे विकसित हो पाई जिनका ग्रामीण अधिवासों मे अभाव था क्योंकि ग्राम पंचायत जैसी व्यवस्था उस सामी टीके विकसित नहीं हुई थी अथवा विकास कि शैशवावस्था में थी। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हें भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों में जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव में आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
       इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों में जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों में पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण लोग, अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी में विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा में मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों में मजदूरी भी करते होंगे। नगरों में श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम की मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न की समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामान्यतः बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  
 अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वर्ण एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों ने पहुँचता था । वास्तव मे ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
कृषि अधिशेष
* भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
* दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों मे हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों मे लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी एफ़एसएल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने मे बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों से आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुटाई करने मे सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा मे अधिशेष अन्न उत्पादन मे सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुस्थापित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व मे आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप मे अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा मे राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य कि संप्रभुता कि सीमा मे नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों कि भी सीमा थी,इनहि नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, गरमीन जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हे भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों मे जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव मे आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों मे जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों मे पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी मे विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा मे मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों मे मजदूरी भी करते होंगे। नगरों मे श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम कि मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न कि समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामनी बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  
अधिशेष  कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा मे नगरीकरण
        हड़प्पा के ग्रामीण क्षेत्रों से द्विमार्गी प्रक्रिया के माध्यम से अधिशेष खाध्यान्न उत्पादन के नगरों में स्थानांतरण हो जाता था। वास्तव मे इन नगर केन्द्रों का पहले हाट बाज़ारों के रूप मे उदय हुआ होगा जिन्होने विकसित होकर नगरों का रूप ले लिया। ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों मे पहुंचे इस अधिशेष कृषि उत्पादन के बलबूते नगरीय व्यापार फला-फूला और यहाँ के व्यापारी समृद्ध होते चले गए। उनका जीवन विलासितापूर्ण होता चला गया। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं विलासिता की वस्तुओं ने कुछ व्यापारियों को व्यापार की एक नई विधा अपनाने के लिए प्रेरित किया होगा। इन व्यापारियों ने कीमती धातुओं एवं बहुमूल्य पत्थरों, क्षृंगार सामाग्री,आदि का व्यापार करना प्रारम्भ कर दिया। वांछित वस्तुओं की खोज में ये व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार मे संलल्ग्न हो गए। इस प्रकार अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ हो गया । हड़प्पा के व्यापारी मिश्र,मेसोपोटामिया,मकन तथा दिलमुन तक आगे बढ़ गए। नगरीय व्यापारियों के पास भारी मात्रा में अधिशेष उत्पादन जमा हो जाता था। सुरक्षा एवं प्रशासन संबंधी आवश्यकताओं ने नगरीय शासक वर्ग को जन्म दिया तथा इस प्रकार नगर पंचायतों अथवा नगर-पालिकाओं का विकास हुआ। नगर प्रमुख, नगर वासियों से, उनको प्रदत्त सुविधाओं जैसे सुरक्षा, सफाई,सड़क निर्माण के बदले अंशदान,कर एवं नजराना प्राप्त करते थे। यह निश्चित ही अन्न के रूप मे होता था, क्योंकि हड़प्पा निवासियों द्वारा अभी तक किसी व्यवस्थित मुद्रा प्रणाली के अस्तित्व के साक्ष्य प्राप्त नही हुए हैं। इस प्रकार कर आदि के रूप मे संग्रहीत इस अन्न को को विशाल अन्नागारों मे सुरक्षित रखा जाता था। नगर निवासी समान्यतः शिल्पी तथा व्यापारी होते थे जो अपने बीच से ही किसी अज्ञात विधि द्वारा नगर प्रमुख
एवं अन्य सहायक अधिकारी वीआरजी का चुनाव करते थे। शायद उसी प्रकार जैसे चोल काल में। इस प्रकार निर्मित येँ नगर-पालिकाएं नगरों के सुचारु संचालन हेतु नियम-विनियम  बनाती थी। नगरपालिका का सर्वप्रमुख कार्य था नगर-नियोजन  तथा सुरक्षा। आपातकाल जैसे सूखा एवं अकाल में राहत सामाग्री के रूप में नगरवासियों में अनाज वितरण का कार्य भी नगरपालिकाएं करती रही होंगी। नगर प्रमुख अथवा नगर शासक स्वयं भी व्यापारी रहे होंगे क्योंकि वे स्वयं व्यापारियों मे से ही चुने जाते थे। नगरपालिकाओं का उदय नगरवासियों की सामूहिक आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप ही हुआ था। ये आवश्यकताएँ निम्नलिखित थी:-
·       नगरों का सुचारु रूप से संचालन एवं प्रबंधन
·       व्यापार प्रबंधन
·       सुरक्षा
1- जंगली जानवरों से
2- ग्रामीणों/चोर-लुटेरों से
इन नगरपालिकाओं ने हड़प्पाई नगर-नियोजन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरों की स्थापना के समय से ही संभवतः ये नगरपालिकाएँ सक्रिय रहती थी। इसी के परिणामस्वरूप दुनिया की प्रथम नगरीय सभ्यता अस्तित्व मे आई। सड़कें चौड़ी तथा एक दूसरे को समकोण चौराहों पर काटती थी। जल निकास की उत्तम व्यवस्था तथा नगरों का समान्यतः शतरंजी प्रतिरूप, इन नगरपालिकाओं द्वारा निर्मित विनियमों द्वारा ही संभव हो पाया। विभिन्न नगरों के नियोजन में समानता के आधार पर यह तर्क नही दिया जा सकता है कि सम्पूर्ण हड़प्पाई क्षेत्र किसी केंद्रीय राज्यसत्ता द्वारा शासित होता होगा।लेकिन इन नगरपालिकाओं के मध्य किसी ढीले-ढाले और सामाजिक संगठन कि संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता है।
इतनी समानताएं कैसे ?
अधिशेष उत्पादन हडप्पा सभ्यता के सामाजिक-आर्थिक विकास का इंजन साबित हुआ। इसने व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों एवं एक राजनीतिक प्रक्रिया कि शुरुआत को जन्म दिया। ग्रामीण समाज को  यह लाभ हुआ कि अब उसका पेट भरने लगा तथा उसकी दैनिक आवश्यकतायें भी पूरी होने लगी। लेकिन यह अधिशेष उत्पादन ग्रामीणों को बहुत ज्यादा समृद्ध नहीं बना पाया क्योंकि इसकी मात्रा बहुत ज्यादा नही थी क्योंकि लकड़ी के हल के द्वारा जुताई की अपनी एक सीमा थी। परंतु इस अधिशेष उत्पादन से नगरीय व्यापारी वर्ग अत्यधिक समृद्ध हो गया। अधिशेष के अधिकांश भाग पर व्यापारी वर्ग नियंत्रण स्थापित करने मे सफल हुआ और उसने इससे अत्यधिक लाभ कमाया। अधिकांश नगर खाध्यान्नों के आगार बन गए। जहां विशाल अन्नागारों में, प्रचुर मात्रा में अनाजों का भंडार उपलब्ध रहता था। इसके विपरीत ग्रामीण समुदाय अभी भी प्रायः अभावग्रस्त जीवन ही जीता रहा। क्योंकि वर्ष के अंत तक अधिशेष अन्न भी समाप्त हो जाता रहा होगा जैसा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के बीच देखने को मिलता है।
   नगरों में विशाल अन्नागारों मे संग्रहीत खाध्यान्नों कि सुरक्षा नगरपालिकाओं के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा। क्योंकि अकाल,सूखा एवं भुखमरी तथा अन्य प्रकृतिक आपदाओं के समय ग्रामीणों द्वारा खाध्यान्न प्राप्ति के लिए अकेले अथवा सामूहिक रूप से आक्रमण किया जाता रहा होगा। ये विशाल अन्नागार ग्रामीण आक्रमणकारियों को ठीक उसी प्रकार लालायित करते होंगे जैसे मध्यकालीन भारत के अत्यंत समृद्ध मंदिर एवं मठों ने विदेशी आक्रांताओं को लालायित किया था। इसके अतिरिक्त घने जंगलों मे उपस्थित खूंखार जंगली जानवरों का भी खतरा लगातार बना रहता था, जिससे नगरीय सुरक्षा की अवश्यकता थी।
इन सभी कारणों ने नगरवासियों को दुर्गीकरण के लिए प्रेरित किया। हड़प्पाई नगरों का दुर्गीकरण किसी बाह्य आक्रमण अथवा किसी आक्रमणकारी सेना से सुरक्षा के लिए नही वरन ग्रामीण अनाज लुटेरों और जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए हुआ होगा। क्योंकि नगरीय समृद्धि अभाव एवं असंतोष के कारण,ग्रामीण आक्रमणों को आकर्षित करती होगी। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्य इतनी संख्या में नही मिले हैं कि यह माना जा सके कि सुदूर क्षेत्रों से हड्प्पाई क्षेत्र की किसी नगरपालिका पर कोई संगठित आक्रमण हुआ हो। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्यों का अल्प अथवा नगण्य संख्या में पाया जाना, बाह्य आक्रमण द्वारा हड़प्पा सभ्यता के पतन को सीरे से नकारने के लिए पर्याप्त है।
   अंततः लंबी दूरी के व्यापार का विकास हुआ जैसा कि पूर्व वर्णित है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं उससे जनित आवश्यकताओं ने लंबी दूरी के व्यापार को प्रोत्साहित किया। उदाहरण के लिए चांदी जो एक बहुमूल्य धातु है, की प्राप्ति के लिए अफगानिस्तान के सुदूर क्षेत्रों तक हड़प्पाई व्यापारियों ने यात्राएं की। लंबी दूरी के व्यापार ने सामाजिक सम्बन्धों का दायरा विकसित किया। लोगों ने व्यापार के माध्यम से एक दूसरे के आचार-विचार को जाना,समझा,अपनाया होगा। इसका यह परिणाम हुआ होगा कि नगर-नियोजन एव्न स्वच्छता, सभ्य होने कि पहचान से जुड़ गए होंगे और ये सामान्य आचार-संहिता के अंग के रूप मे सामने आए होंगे जिनको एक नगरपालिका से दूसरी ने व्यापारियों के माध्यम से अपनाया होगा। 

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अधिशेष कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा मे नगरीकरण

अधिशेष  कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा में नगरीकरण
                                        @सुनील सत्यम
हड़प्पा के ग्रामीण क्षेत्रों से द्विमार्गी प्रक्रिया के माध्यम से, अधिशेष खाध्यान्न उत्पादन नगरों में स्थानांतरित हो जाता था। वास्तव में इन नगर केन्द्रों का पहले हाट बाज़ारों के रूप में उदय हुआ होगा, जिन्होने विकसित होकर नगरों का रूप ले लिया। ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में पहुंचे इस अधिशेष कृषि उत्पादन के बलबूते नगरीय व्यापार फला-फूला और यहाँ के व्यापारी समृद्ध होते चले गए। उनका जीवन विलासितापूर्ण होता चला गया। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं विलासिता की वस्तुओं ने कुछ व्यापारियों को व्यापार की एक नई विधा अपनाने के लिए प्रेरित किया होगा। इन व्यापारियों ने कीमती धातुओं एवं बहुमूल्य पत्थरों, क्षृंगार सामाग्री,आदि का व्यापार करना प्रारम्भ कर दिया। वांछित वस्तुओं की खोज में ये व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार में संलल्ग्न हो गए। इस प्रकार अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ हो गया । हड़प्पा के व्यापारी मिश्र,मेसोपोटामिया,मकन तथा दिलमुन तक आगे बढ़ गए। नगरीय व्यापारियों के पास भारी मात्रा में अधिशेष उत्पादन जमा हो जाता था। सुरक्षा एवं प्रशासन संबंधी आवश्यकताओं ने नगरीय शासक वर्ग को जन्म दिया तथा इस प्रकार नगर पंचायतों अथवा नगर-पालिकाओं का विकास हुआ। नगर प्रमुख, नगर वासियों से, उनको प्रदत्त सुविधाओं जैसे सुरक्षा, सफाई,सड़क निर्माण के बदले अंशदान,कर एवं नजराना प्राप्त करते थे। यह निश्चित ही अन्न के रूप में होता था, क्योंकि हड़प्पा निवासियों द्वारा अभी तक किसी व्यवस्थित मुद्रा प्रणाली के अस्तित्व के साक्ष्य प्राप्त नही हुए हैं। इस प्रकार कर आदि के रूप में संग्रहीत इस अन्न को को विशाल अन्नागारों में सुरक्षित रखा जाता था। नगर निवासी समान्यतः शिल्पी तथा व्यापारी होते थे जो अपने बीच से ही किसी अज्ञात विधि द्वारा नगर प्रमुख
एवं अन्य सहायक अधिकारी वीआरजी का चुनाव करते थे। शायद उसी प्रकार जैसे चोल काल में। इस प्रकार निर्मित येँ नगर-पालिकाएं नगरों के सुचारु संचालन हेतु नियम-विनियम  बनाती थी। नगरपालिका का सर्वप्रमुख कार्य था नगर-नियोजन  तथा सुरक्षा। आपातकाल जैसे सूखा एवं अकाल में राहत सामाग्री के रूप में नगरवासियों में अनाज वितरण का कार्य भी नगरपालिकाएं करती रही होंगी। नगर प्रमुख अथवा नगर शासक स्वयं भी व्यापारी रहे होंगे क्योंकि वे स्वयं व्यापारियों से बीच से ही चुने जाते थे। नगरपालिकाओं का उदय नगरवासियों की सामूहिक आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप ही हुआ था। ये आवश्यकताएँ निम्नलिखित थी:-
·        नगरों का सुचारु रूप से संचालन एवं प्रबंधन
·      *  व्यापार प्रबंधन
·      *  सुरक्षा
1-  जंगली जानवरों से
2-  ग्रामीणों/चोर-लुटेरों से
इन नगरपालिकाओं ने हड़प्पाई नगर-नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरों की स्थापना के समय से ही संभवतः ये नगरपालिकाएँ सक्रिय रहती थी। इसी के परिणामस्वरूप दुनिया की प्रथम नगरीय सभ्यता अस्तित्व में आई। सड़कें चौड़ी तथा एक दूसरे को समकोण चौराहों पर काटती थी। जल निकास की उत्तम व्यवस्था तथा नगरों का समान्यतः शतरंजी प्रतिरूप, इन नगरपालिकाओं द्वारा निर्मित विनियमों द्वारा ही संभव हो पाया। विभिन्न नगरों के नियोजन में समानता के आधार पर यह तर्क नही दिया जा सकता है कि सम्पूर्ण हड़प्पाई क्षेत्र किसी केंद्रीय राज्यसत्ता द्वारा शासित होता होगा।लेकिन इन नगरपालिकाओं के मध्य किसी ढीले-ढाले और सामाजिक संगठन की संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता है।
इतनी समानताएं कैसे ?
अधिशेष उत्पादन हडप्पा सभ्यता के सामाजिक-आर्थिक विकास का इंजन साबित हुआ। इसने व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों एवं एक राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत को जन्म दिया। ग्रामीण समाज को  यह लाभ हुआ कि अब उसका पेट भरने लगा तथा उसकी दैनिक आवश्यकतायें भी पूरी होने लगी। लेकिन यह अधिशेष उत्पादन ग्रामीणों को बहुत ज्यादा समृद्ध नहीं बना पाया क्योंकि इसकी मात्रा बहुत ज्यादा नही थी, क्योंकि लकड़ी के हल के द्वारा जुताई की अपनी एक सीमा थी। परंतु इस अधिशेष उत्पादन से नगरीय व्यापारी वर्ग अत्यधिक समृद्ध हो गया। अधिशेष के अधिकांश भाग पर व्यापारी वर्ग नियंत्रण स्थापित करने में सफल हुआ और उसने इससे अत्यधिक लाभ कमाया। अधिकांश नगर खाध्यान्नों के आगार बन गए। जहां विशाल अन्नागारों में, प्रचुर मात्रा में अनाजों का भंडार उपलब्ध रहता था। इसके विपरीत ग्रामीण समुदाय अभी भी प्रायः अभावग्रस्त जीवन ही जीता रहा। क्योंकि वर्ष के अंत तक अधिशेष अन्न भी समाप्त हो जाता रहा होगा जैसा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के बीच देखने को मिलता है।
                           ---------------------------------
                         अतीत-मंथन
                           ---------------------------------
   नगरों में विशाल अन्नागारों में संग्रहीत खाध्यान्नों की सुरक्षा नगरपालिकाओं के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा। क्योंकि अकाल,सूखा एवं भुखमरी तथा अन्य प्रकृतिक आपदाओं के समय ग्रामीणों द्वारा खाध्यान्न प्राप्ति के लिए अकेले अथवा सामूहिक रूप से आक्रमण किया जाता रहा होगा। ये विशाल अन्नागार, ग्रामीण आक्रमणकारियों को ठीक उसी प्रकार लालायित करते होंगे जैसे मध्यकालीन भारत के अत्यंत समृद्ध मंदिर एवं मठों ने विदेशी आक्रांताओं को लालायित किया था। इसके अतिरिक्त घने जंगलों में उपस्थित खूंखार जंगली जानवरों का भी खतरा लगातार बना रहता था, जिससे नगरीय सुरक्षा की अवश्यकता थी।
इन सभी कारणों ने नगरवासियों को दुर्गीकरण के लिए प्रेरित किया। हड़प्पाई नगरों का दुर्गीकरण किसी बाह्य आक्रमण अथवा किसी आक्रमणकारी सेना से सुरक्षा के लिए नही वरन ग्रामीण अनाज लुटेरों और जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए हुआ होगा। क्योंकि नगरीय समृद्धि, अभाव एवं असंतोष के कारण,ग्रामीण आक्रमणों को आकर्षित करती होगी। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्य इतनी संख्या में नही मिले हैं कि यह माना जा सके कि सुदूर क्षेत्रों से हड्प्पाई क्षेत्र की किसी नगरपालिका पर कोई संगठित आक्रमण हुआ होगा। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्यों का अल्प अथवा नगण्य संख्या में पाया जाना, बाह्य आक्रमण द्वारा हड़प्पा सभ्यता के पतन को सीरे से नकारने के लिए पर्याप्त है।

   अंततः लंबी दूरी के व्यापार का विकास हुआ जैसा कि पूर्व वर्णित है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं उससे जनित आवश्यकताओं ने लंबी दूरी के व्यापार को प्रोत्साहित किया। उदाहरण के लिए चांदी जो एक बहुमूल्य धातु है, की प्राप्ति के लिए अफगानिस्तान के सुदूर क्षेत्रों तक हड़प्पाई व्यापारियों ने यात्राएं की। लंबी दूरी के व्यापार ने सामाजिक सम्बन्धों का दायरा विकसित किया। लोगों ने व्यापार के माध्यम से एक दूसरे के आचार-विचार को जाना,समझा,अपनाया होगा। इसका यह परिणाम हुआ होगा कि नगर-नियोजन एवं स्वच्छता, सभ्य होने की पहचान से जुड़ गए होंगे और ये सामान्य आचार-संहिता के अंग के रूप में सामने आए होंगे, जिनको एक नगरपालिका से दूसरी ने व्यापारियों के माध्यम से अपनाया होगा। 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण
@सुनील सत्यम
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वरन एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों में पहुँचता था । वास्तव में ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
  ------------------------------------------
                       अतीत-मंथन
---------------------------------------------                            
*1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
*2- दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--
दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने के लिए नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों में हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी फसल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने में बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुताई करने में सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा में अधिशेष अन्न उत्पादन करने में सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुव्यवस्थित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व में आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप में अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा में राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य की संप्रभुता की सीमा में नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों की भी सीमा थी,इन्ही नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, ग्रामीण जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। इससे यह निष्कर्ष निकालना तार्किक एवं उचित रहेगा कि हड़प्पा कि राजसत्ता सबसे पहले नगर-पालिकाओं के रूप मे विकसित हुए।हड़प्पा, मोहंजोदड़ों, धोलावीरा,राखीगढ़ी ,लोथल आदि इस सभ्यता कि प्रतिनिधि नगर-पालिकाएं थी। यह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि इन सभी नगर-पालिकाओं मे समान नागरिक सुविधाओं जैसे सुनियोजित नगरीकरण, चौड़ी सड़के, व्यवस्थित जल निकासी आदि एक समान प्रतिरूप मे विकसित हो पाई जिनका ग्रामीण अधिवासों मे अभाव था क्योंकि ग्राम पंचायत जैसी व्यवस्था उस सामी टीके विकसित नहीं हुई थी अथवा विकास कि शैशवावस्था में थी। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हें भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों में जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव में आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
       इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों में जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों में पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण लोग, अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी में विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा में मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों में मजदूरी भी करते होंगे। नगरों में श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम की मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न की समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामान्यतः बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  






मंगलवार, 12 सितंबर 2017

हड़प्पा सभ्यता एवं कृषि अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण

अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वर्ण एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों ने पहुँचता था । वास्तव मे ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।

                                             कृषि अधिशेष
* भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
* दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों मे हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों मे लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी एफ़एसएल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने मे बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों से आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुटाई करने मे सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा मे अधिशेष अन्न उत्पादन मे सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुस्थापित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व मे आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप मे अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा मे राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य कि संप्रभुता कि सीमा मे नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों कि भी सीमा थी,इनहि नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, गरमीन जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। 
दैनिक आवश्यकता कि वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हे भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों मे जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव मे आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों मे जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों मे पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी मे विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा मे मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों मे मजदूरी भी करते होंगे। नगरों मे श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम कि मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न कि समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामनी बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।