रविवार, 17 सितंबर 2017

भारत मे ग्राम पंचायतों का इतिहास

            पंचायतें: इतिहास,वर्तमान, एवं सुधार की आवश्यकता-1
                           @ सुनील सत्यम
भारत में पंचायतों का इतिहास काफी पुराना है। नवीन दृष्टिकोण से देखें तो हड़प्पा काल में नागरिक शासन का प्रमुख रूप नगर-पंचायतों के रूप में ही सामने आया । केंद्रीकृत शासन की कल्पना तत्कालीन संदर्भों में तार्किक नही है। अतः हड़प्पा, मोहनजोदड़ों, राखीगढ़ी, लोथल एवं धोलावीरा का नगर-पंचायतों (पालिकाओं) के रूप में ही विकास हुआ था। वैदिक साहित्य मे भी पंचायतों का सभा,समिति एवं विदथ के रूप में अस्तित्व था। सभा को “नरिष्ठा” कहा गया है अर्थात इसके निर्णय की अवहेलना नहीं की जा सकती थी। निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते थे। वैदिक साहित्य में ग्राम पंचायत के प्रमुख के लिए “ग्रामणी” शब्द का उल्लेख किया गया है।ऋग्वेद मे सभा और समिति को प्रजापिता की दो पौत्रियों के रूप मे महत्व दिया गया है।  पाणिनी ने भी अपनी कालजयी पुस्तक “अष्टाध्यायी” में गराजयों का विवरण दिया है।मौर्यकाल मे ग्राम एवं नगर-पंचायत के गठन एवं कार्यों का विशद विवरण मिलता है। ग्राम पंचायत का प्रमुख ग्राम-भोजक कहलाता था जिसका कार्य अभियोगों का निर्णयन, जुआँ तथा मध्य निषेद एवं पशु हिंसा पर रोक लगाना आदि था। मेगास्थनीज ने पाटलिपुत्र की नगर व्यवस्था का रोचक विवरण मिलता है जिसका संचालन 30 सदस्यों से निर्मित 6 प्रमुख समितियों द्वारा किया जाता था। इनमे से एक समिति का कार्य जनगणना करने का था जो आज के संदर्भ मे अत्यंत महत्वपूर्ण है।चाणक्य ने अर्थशास्त्र में पंचायत व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया है। चौरोद्धर्णिक मौर्यकाल का एक ग्राम स्तर का अधिकारी था जिससे चौधरी शब्द की उत्पत्ति हुई। इसका कार्य ग्राम मे चौरों का पता लगाकर समस्या का निवारण करना था। पालि साहित्य में भी समितियों का वृहद उल्लेख मिलता है। समितियों का चुनाव नागरिकों के मध्य से किया जाता था। समितियों की कार्यपददती का स्पष्ट विवरण बौद्ध साहित्य में मिलता है।  विदथ की बैठकों मे महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। गुप्तकाल मे भी पंचायतें कई रूपों में अस्तित्वमान रही जैसे श्रेणियाँ। व्यवस्थित रूप में पंचायतों का विकास चोल काल में हुआ। चोल काल में पंचायतें समितियों के रूप में कार्य करती थी।  चोलकालीन प्रसिद्द उत्तरमेरुर लेख से चोलकालीन पंचायत व्यवस्था का व्यापक विवरण मिलता है। चोल काल में स्थानीय स्वशासन का जो विकास हुआ वैसा दुनिया के किसी अन्य देश में देखने को नहीं मिला है। चोलकाल में ग्राम स्वशासन की पूर्ण इकाई थे, ग्रामवासी अपने मध्य से लोकतान्त्रिक तरीके से चुने सदस्यों के माध्यम से ग्राम का प्रशासन स्वयं संचालित करते थे। चोल शासकों के विभिन्न अभिलेखों से इस व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश पड़ता है।
उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार ग्राम को प्रशासनिक दृष्टि से कई भागों में विभाजित कर दिया जाता था।जैसे उपवन,सिंचाई, आदि। निर्धारित योग्यता रखने वाले एक व्यक्ति को ही किसी समिति के लिए सदस्य चुना जाता था। समिति का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यता आवश्यक थी- (1) सदस्य संबन्धित ग्राम का मूलनिवासी हो। (2) उसकी आयु 35 और 70 वर्ष के बीच हो। (3) एक-चौथाई वेलि (लगभग डेढ़ एकड़) से अधिक भूमि का स्वामी हो। (4) वह स्वयं की भूमि पर बनाये मकान में रहता हो। (5) वेदत्रयी का ज्ञाता हो, वैदिक मन्त्रों और ब्राह्मण ग्रन्थों का सम्यक ज्ञान रखता हो।कोई व्यक्ति का सदस्य नही चुना जा सकता था यदि वह:
1.  पिछले तीन वर्षों से किसी समिति का सदस्य रहा हो।
2.  उसने सदस्य के रूप में आय-व्यय का लेखा-जोखा अपने विभाग को न दिया हो।
3.  भयंकर अपराधों में लिप्त रहा हो।
इस प्रकार निर्वाचन हेतु सभी शर्तें पूरी करने वाले व्यक्ति का लॉटरी प्रणाली से चयन किया जाता था। उम्मीदवार सदस्यों के नाम ताडपत्र पर लिखकर एक घड़े डाल दिये जाते थे जिनमे से किसी बालक द्वारा निकाले हुए पर्चे के आधार पर सदस्य का चुनाव हो जाता था।  इन सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष था। इन सदस्यों में 12 स्थायी समिति के, 12 उपवन समिति के और 7 तालाब समिति के लिए चुने जाते थे। समिति को वारियम कहते थे और यह ग्राम सभा के कार्यों का संचालन करती थी। ग्राम सभा के कार्यों के लिए कई समितियां होती थीं।
ग्राम सभा के अनेक कार्य थे। यह भूमिकर एकत्र करके सरकारी खजाने में जमा करती थी। तालाबों और सिंचाई के साधनों का प्रबन्ध करती थी। ग्राम के मन्दिरों और सार्वजनिक स्थानों की देखभाल, ग्रामवासियों के मुकदमों का फैसला करना, ग्राम की सड़कों को बनवाना, ग्राम में औषधालय खोलना, ग्राम के बाजारों और पेठों का प्रबन्ध करना, इत्यादि ग्राम सभा के कार्य थे।
ग्राम सभा की बैठक मन्दिर अथवा किसी बड़े वृक्ष के नीचे होती थी। राज्य ग्राम पंचायतों के मामलों हस्तक्षेप नहीं करता था। स्पष्ट है कि ग्राम स्थानीय स्वशासन की एक मूल इकाई था।
व्यापारियों से संबंधित हितों की देखभाल हेतु-मणिग्रामम्, वलंजियार, नानादेशी जैसे समूह थे। धार्मिक हित समूहों में मूलपेरूदियार था। यह मंदिरों की व्यवस्था की निगरानी करता था। संपूर्ण साम्राज्य मंडलों (प्रान्तों) में बंटा हुआ था। प्रान्तों का विभाजन वलनाडु या नाडु में होता था। उसके नीचे गांव का समूह कुर्रम या कोट्टम कहलाता था। सबसे नीचे गांव था। ग्राम की स्थिति पट्टे के अनुसार भिन्न प्रकार की होती थी। गांवों की तीन श्रेणियाँ थीं- ऐसे ग्राम सबसे ज्यादा होते थे जिनमें अंतर्जातीय आबादी होती थी एवं जो भू-राजस्व थे। सबसे कम संख्या में ऐसे ग्राम होते थे जो ब्रह्मदेय कहलाते थे एवं इनमें पूरा ग्राम या ग्राम की भूमि किसी एक ब्राह्मण समूह को दी गई होती थी। ब्रह्मदेय से संबंधित अग्रहार अनुदान होता था जिसमें ग्राम ब्राह्मण बस्ती होता था एवं भूमि अनुदान में दी गई होती थी। ये भी कर मुक्त थे, किन्तु ब्राह्मण अपनी इच्छा से नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था कर सकते थे।



शनिवार, 16 सितंबर 2017

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण



हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण
                                                                            @सुनील सत्यम
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वरन एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों में पहुँचता था । वास्तव में ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
*1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
*2- दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--
दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने के लिए नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों में हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी फसल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने में बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुताई करने में सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा में अधिशेष अन्न उत्पादन करने में सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुव्यवस्थित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व में आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप में अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा में राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य की संप्रभुता की सीमा में नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों की भी सीमा थी,इन्ही नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, ग्रामीण जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। इससे यह निष्कर्ष निकालना तार्किक एवं उचित रहेगा कि हड़प्पा कि राजसत्ता सबसे पहले नगर-पालिकाओं के रूप मे विकसित हुए।हड़प्पा, मोहंजोदड़ों, धोलावीरा,राखीगढ़ी ,लोथल आदि इस सभ्यता कि प्रतिनिधि नगर-पालिकाएं थी। यह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि इन सभी नगर-पालिकाओं मे समान नागरिक सुविधाओं जैसे सुनियोजित नगरीकरण, चौड़ी सड़के, व्यवस्थित जल निकासी आदि एक समान प्रतिरूप मे विकसित हो पाई जिनका ग्रामीण अधिवासों मे अभाव था क्योंकि ग्राम पंचायत जैसी व्यवस्था उस सामी टीके विकसित नहीं हुई थी अथवा विकास कि शैशवावस्था में थी। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हें भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों में जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव में आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
       इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों में जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों में पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण लोग, अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी में विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा में मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों में मजदूरी भी करते होंगे। नगरों में श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम की मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न की समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामान्यतः बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  
 अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वर्ण एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों ने पहुँचता था । वास्तव मे ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
कृषि अधिशेष
* भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
* दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों मे हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों मे लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी एफ़एसएल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने मे बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों से आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुटाई करने मे सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा मे अधिशेष अन्न उत्पादन मे सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुस्थापित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व मे आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप मे अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा मे राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य कि संप्रभुता कि सीमा मे नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों कि भी सीमा थी,इनहि नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, गरमीन जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हे भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों मे जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव मे आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों मे जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों मे पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी मे विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा मे मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों मे मजदूरी भी करते होंगे। नगरों मे श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम कि मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न कि समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामनी बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  
अधिशेष  कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा मे नगरीकरण
        हड़प्पा के ग्रामीण क्षेत्रों से द्विमार्गी प्रक्रिया के माध्यम से अधिशेष खाध्यान्न उत्पादन के नगरों में स्थानांतरण हो जाता था। वास्तव मे इन नगर केन्द्रों का पहले हाट बाज़ारों के रूप मे उदय हुआ होगा जिन्होने विकसित होकर नगरों का रूप ले लिया। ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों मे पहुंचे इस अधिशेष कृषि उत्पादन के बलबूते नगरीय व्यापार फला-फूला और यहाँ के व्यापारी समृद्ध होते चले गए। उनका जीवन विलासितापूर्ण होता चला गया। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं विलासिता की वस्तुओं ने कुछ व्यापारियों को व्यापार की एक नई विधा अपनाने के लिए प्रेरित किया होगा। इन व्यापारियों ने कीमती धातुओं एवं बहुमूल्य पत्थरों, क्षृंगार सामाग्री,आदि का व्यापार करना प्रारम्भ कर दिया। वांछित वस्तुओं की खोज में ये व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार मे संलल्ग्न हो गए। इस प्रकार अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ हो गया । हड़प्पा के व्यापारी मिश्र,मेसोपोटामिया,मकन तथा दिलमुन तक आगे बढ़ गए। नगरीय व्यापारियों के पास भारी मात्रा में अधिशेष उत्पादन जमा हो जाता था। सुरक्षा एवं प्रशासन संबंधी आवश्यकताओं ने नगरीय शासक वर्ग को जन्म दिया तथा इस प्रकार नगर पंचायतों अथवा नगर-पालिकाओं का विकास हुआ। नगर प्रमुख, नगर वासियों से, उनको प्रदत्त सुविधाओं जैसे सुरक्षा, सफाई,सड़क निर्माण के बदले अंशदान,कर एवं नजराना प्राप्त करते थे। यह निश्चित ही अन्न के रूप मे होता था, क्योंकि हड़प्पा निवासियों द्वारा अभी तक किसी व्यवस्थित मुद्रा प्रणाली के अस्तित्व के साक्ष्य प्राप्त नही हुए हैं। इस प्रकार कर आदि के रूप मे संग्रहीत इस अन्न को को विशाल अन्नागारों मे सुरक्षित रखा जाता था। नगर निवासी समान्यतः शिल्पी तथा व्यापारी होते थे जो अपने बीच से ही किसी अज्ञात विधि द्वारा नगर प्रमुख
एवं अन्य सहायक अधिकारी वीआरजी का चुनाव करते थे। शायद उसी प्रकार जैसे चोल काल में। इस प्रकार निर्मित येँ नगर-पालिकाएं नगरों के सुचारु संचालन हेतु नियम-विनियम  बनाती थी। नगरपालिका का सर्वप्रमुख कार्य था नगर-नियोजन  तथा सुरक्षा। आपातकाल जैसे सूखा एवं अकाल में राहत सामाग्री के रूप में नगरवासियों में अनाज वितरण का कार्य भी नगरपालिकाएं करती रही होंगी। नगर प्रमुख अथवा नगर शासक स्वयं भी व्यापारी रहे होंगे क्योंकि वे स्वयं व्यापारियों मे से ही चुने जाते थे। नगरपालिकाओं का उदय नगरवासियों की सामूहिक आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप ही हुआ था। ये आवश्यकताएँ निम्नलिखित थी:-
·       नगरों का सुचारु रूप से संचालन एवं प्रबंधन
·       व्यापार प्रबंधन
·       सुरक्षा
1- जंगली जानवरों से
2- ग्रामीणों/चोर-लुटेरों से
इन नगरपालिकाओं ने हड़प्पाई नगर-नियोजन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरों की स्थापना के समय से ही संभवतः ये नगरपालिकाएँ सक्रिय रहती थी। इसी के परिणामस्वरूप दुनिया की प्रथम नगरीय सभ्यता अस्तित्व मे आई। सड़कें चौड़ी तथा एक दूसरे को समकोण चौराहों पर काटती थी। जल निकास की उत्तम व्यवस्था तथा नगरों का समान्यतः शतरंजी प्रतिरूप, इन नगरपालिकाओं द्वारा निर्मित विनियमों द्वारा ही संभव हो पाया। विभिन्न नगरों के नियोजन में समानता के आधार पर यह तर्क नही दिया जा सकता है कि सम्पूर्ण हड़प्पाई क्षेत्र किसी केंद्रीय राज्यसत्ता द्वारा शासित होता होगा।लेकिन इन नगरपालिकाओं के मध्य किसी ढीले-ढाले और सामाजिक संगठन कि संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता है।
इतनी समानताएं कैसे ?
अधिशेष उत्पादन हडप्पा सभ्यता के सामाजिक-आर्थिक विकास का इंजन साबित हुआ। इसने व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों एवं एक राजनीतिक प्रक्रिया कि शुरुआत को जन्म दिया। ग्रामीण समाज को  यह लाभ हुआ कि अब उसका पेट भरने लगा तथा उसकी दैनिक आवश्यकतायें भी पूरी होने लगी। लेकिन यह अधिशेष उत्पादन ग्रामीणों को बहुत ज्यादा समृद्ध नहीं बना पाया क्योंकि इसकी मात्रा बहुत ज्यादा नही थी क्योंकि लकड़ी के हल के द्वारा जुताई की अपनी एक सीमा थी। परंतु इस अधिशेष उत्पादन से नगरीय व्यापारी वर्ग अत्यधिक समृद्ध हो गया। अधिशेष के अधिकांश भाग पर व्यापारी वर्ग नियंत्रण स्थापित करने मे सफल हुआ और उसने इससे अत्यधिक लाभ कमाया। अधिकांश नगर खाध्यान्नों के आगार बन गए। जहां विशाल अन्नागारों में, प्रचुर मात्रा में अनाजों का भंडार उपलब्ध रहता था। इसके विपरीत ग्रामीण समुदाय अभी भी प्रायः अभावग्रस्त जीवन ही जीता रहा। क्योंकि वर्ष के अंत तक अधिशेष अन्न भी समाप्त हो जाता रहा होगा जैसा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के बीच देखने को मिलता है।
   नगरों में विशाल अन्नागारों मे संग्रहीत खाध्यान्नों कि सुरक्षा नगरपालिकाओं के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा। क्योंकि अकाल,सूखा एवं भुखमरी तथा अन्य प्रकृतिक आपदाओं के समय ग्रामीणों द्वारा खाध्यान्न प्राप्ति के लिए अकेले अथवा सामूहिक रूप से आक्रमण किया जाता रहा होगा। ये विशाल अन्नागार ग्रामीण आक्रमणकारियों को ठीक उसी प्रकार लालायित करते होंगे जैसे मध्यकालीन भारत के अत्यंत समृद्ध मंदिर एवं मठों ने विदेशी आक्रांताओं को लालायित किया था। इसके अतिरिक्त घने जंगलों मे उपस्थित खूंखार जंगली जानवरों का भी खतरा लगातार बना रहता था, जिससे नगरीय सुरक्षा की अवश्यकता थी।
इन सभी कारणों ने नगरवासियों को दुर्गीकरण के लिए प्रेरित किया। हड़प्पाई नगरों का दुर्गीकरण किसी बाह्य आक्रमण अथवा किसी आक्रमणकारी सेना से सुरक्षा के लिए नही वरन ग्रामीण अनाज लुटेरों और जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए हुआ होगा। क्योंकि नगरीय समृद्धि अभाव एवं असंतोष के कारण,ग्रामीण आक्रमणों को आकर्षित करती होगी। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्य इतनी संख्या में नही मिले हैं कि यह माना जा सके कि सुदूर क्षेत्रों से हड्प्पाई क्षेत्र की किसी नगरपालिका पर कोई संगठित आक्रमण हुआ हो। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्यों का अल्प अथवा नगण्य संख्या में पाया जाना, बाह्य आक्रमण द्वारा हड़प्पा सभ्यता के पतन को सीरे से नकारने के लिए पर्याप्त है।
   अंततः लंबी दूरी के व्यापार का विकास हुआ जैसा कि पूर्व वर्णित है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं उससे जनित आवश्यकताओं ने लंबी दूरी के व्यापार को प्रोत्साहित किया। उदाहरण के लिए चांदी जो एक बहुमूल्य धातु है, की प्राप्ति के लिए अफगानिस्तान के सुदूर क्षेत्रों तक हड़प्पाई व्यापारियों ने यात्राएं की। लंबी दूरी के व्यापार ने सामाजिक सम्बन्धों का दायरा विकसित किया। लोगों ने व्यापार के माध्यम से एक दूसरे के आचार-विचार को जाना,समझा,अपनाया होगा। इसका यह परिणाम हुआ होगा कि नगर-नियोजन एव्न स्वच्छता, सभ्य होने कि पहचान से जुड़ गए होंगे और ये सामान्य आचार-संहिता के अंग के रूप मे सामने आए होंगे जिनको एक नगरपालिका से दूसरी ने व्यापारियों के माध्यम से अपनाया होगा। 

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

अधिशेष कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा मे नगरीकरण

अधिशेष  कृषि उत्पादन एवं हड़प्पा में नगरीकरण
                                        @सुनील सत्यम
हड़प्पा के ग्रामीण क्षेत्रों से द्विमार्गी प्रक्रिया के माध्यम से, अधिशेष खाध्यान्न उत्पादन नगरों में स्थानांतरित हो जाता था। वास्तव में इन नगर केन्द्रों का पहले हाट बाज़ारों के रूप में उदय हुआ होगा, जिन्होने विकसित होकर नगरों का रूप ले लिया। ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में पहुंचे इस अधिशेष कृषि उत्पादन के बलबूते नगरीय व्यापार फला-फूला और यहाँ के व्यापारी समृद्ध होते चले गए। उनका जीवन विलासितापूर्ण होता चला गया। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं विलासिता की वस्तुओं ने कुछ व्यापारियों को व्यापार की एक नई विधा अपनाने के लिए प्रेरित किया होगा। इन व्यापारियों ने कीमती धातुओं एवं बहुमूल्य पत्थरों, क्षृंगार सामाग्री,आदि का व्यापार करना प्रारम्भ कर दिया। वांछित वस्तुओं की खोज में ये व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार में संलल्ग्न हो गए। इस प्रकार अंतर्राज्यीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रारम्भ हो गया । हड़प्पा के व्यापारी मिश्र,मेसोपोटामिया,मकन तथा दिलमुन तक आगे बढ़ गए। नगरीय व्यापारियों के पास भारी मात्रा में अधिशेष उत्पादन जमा हो जाता था। सुरक्षा एवं प्रशासन संबंधी आवश्यकताओं ने नगरीय शासक वर्ग को जन्म दिया तथा इस प्रकार नगर पंचायतों अथवा नगर-पालिकाओं का विकास हुआ। नगर प्रमुख, नगर वासियों से, उनको प्रदत्त सुविधाओं जैसे सुरक्षा, सफाई,सड़क निर्माण के बदले अंशदान,कर एवं नजराना प्राप्त करते थे। यह निश्चित ही अन्न के रूप में होता था, क्योंकि हड़प्पा निवासियों द्वारा अभी तक किसी व्यवस्थित मुद्रा प्रणाली के अस्तित्व के साक्ष्य प्राप्त नही हुए हैं। इस प्रकार कर आदि के रूप में संग्रहीत इस अन्न को को विशाल अन्नागारों में सुरक्षित रखा जाता था। नगर निवासी समान्यतः शिल्पी तथा व्यापारी होते थे जो अपने बीच से ही किसी अज्ञात विधि द्वारा नगर प्रमुख
एवं अन्य सहायक अधिकारी वीआरजी का चुनाव करते थे। शायद उसी प्रकार जैसे चोल काल में। इस प्रकार निर्मित येँ नगर-पालिकाएं नगरों के सुचारु संचालन हेतु नियम-विनियम  बनाती थी। नगरपालिका का सर्वप्रमुख कार्य था नगर-नियोजन  तथा सुरक्षा। आपातकाल जैसे सूखा एवं अकाल में राहत सामाग्री के रूप में नगरवासियों में अनाज वितरण का कार्य भी नगरपालिकाएं करती रही होंगी। नगर प्रमुख अथवा नगर शासक स्वयं भी व्यापारी रहे होंगे क्योंकि वे स्वयं व्यापारियों से बीच से ही चुने जाते थे। नगरपालिकाओं का उदय नगरवासियों की सामूहिक आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप ही हुआ था। ये आवश्यकताएँ निम्नलिखित थी:-
·        नगरों का सुचारु रूप से संचालन एवं प्रबंधन
·      *  व्यापार प्रबंधन
·      *  सुरक्षा
1-  जंगली जानवरों से
2-  ग्रामीणों/चोर-लुटेरों से
इन नगरपालिकाओं ने हड़प्पाई नगर-नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरों की स्थापना के समय से ही संभवतः ये नगरपालिकाएँ सक्रिय रहती थी। इसी के परिणामस्वरूप दुनिया की प्रथम नगरीय सभ्यता अस्तित्व में आई। सड़कें चौड़ी तथा एक दूसरे को समकोण चौराहों पर काटती थी। जल निकास की उत्तम व्यवस्था तथा नगरों का समान्यतः शतरंजी प्रतिरूप, इन नगरपालिकाओं द्वारा निर्मित विनियमों द्वारा ही संभव हो पाया। विभिन्न नगरों के नियोजन में समानता के आधार पर यह तर्क नही दिया जा सकता है कि सम्पूर्ण हड़प्पाई क्षेत्र किसी केंद्रीय राज्यसत्ता द्वारा शासित होता होगा।लेकिन इन नगरपालिकाओं के मध्य किसी ढीले-ढाले और सामाजिक संगठन की संभावना से भी इंकार नही किया जा सकता है।
इतनी समानताएं कैसे ?
अधिशेष उत्पादन हडप्पा सभ्यता के सामाजिक-आर्थिक विकास का इंजन साबित हुआ। इसने व्यापक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों एवं एक राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत को जन्म दिया। ग्रामीण समाज को  यह लाभ हुआ कि अब उसका पेट भरने लगा तथा उसकी दैनिक आवश्यकतायें भी पूरी होने लगी। लेकिन यह अधिशेष उत्पादन ग्रामीणों को बहुत ज्यादा समृद्ध नहीं बना पाया क्योंकि इसकी मात्रा बहुत ज्यादा नही थी, क्योंकि लकड़ी के हल के द्वारा जुताई की अपनी एक सीमा थी। परंतु इस अधिशेष उत्पादन से नगरीय व्यापारी वर्ग अत्यधिक समृद्ध हो गया। अधिशेष के अधिकांश भाग पर व्यापारी वर्ग नियंत्रण स्थापित करने में सफल हुआ और उसने इससे अत्यधिक लाभ कमाया। अधिकांश नगर खाध्यान्नों के आगार बन गए। जहां विशाल अन्नागारों में, प्रचुर मात्रा में अनाजों का भंडार उपलब्ध रहता था। इसके विपरीत ग्रामीण समुदाय अभी भी प्रायः अभावग्रस्त जीवन ही जीता रहा। क्योंकि वर्ष के अंत तक अधिशेष अन्न भी समाप्त हो जाता रहा होगा जैसा कि आज भी ग्रामीण क्षेत्र के किसानों के बीच देखने को मिलता है।
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                         अतीत-मंथन
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   नगरों में विशाल अन्नागारों में संग्रहीत खाध्यान्नों की सुरक्षा नगरपालिकाओं के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा। क्योंकि अकाल,सूखा एवं भुखमरी तथा अन्य प्रकृतिक आपदाओं के समय ग्रामीणों द्वारा खाध्यान्न प्राप्ति के लिए अकेले अथवा सामूहिक रूप से आक्रमण किया जाता रहा होगा। ये विशाल अन्नागार, ग्रामीण आक्रमणकारियों को ठीक उसी प्रकार लालायित करते होंगे जैसे मध्यकालीन भारत के अत्यंत समृद्ध मंदिर एवं मठों ने विदेशी आक्रांताओं को लालायित किया था। इसके अतिरिक्त घने जंगलों में उपस्थित खूंखार जंगली जानवरों का भी खतरा लगातार बना रहता था, जिससे नगरीय सुरक्षा की अवश्यकता थी।
इन सभी कारणों ने नगरवासियों को दुर्गीकरण के लिए प्रेरित किया। हड़प्पाई नगरों का दुर्गीकरण किसी बाह्य आक्रमण अथवा किसी आक्रमणकारी सेना से सुरक्षा के लिए नही वरन ग्रामीण अनाज लुटेरों और जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए हुआ होगा। क्योंकि नगरीय समृद्धि, अभाव एवं असंतोष के कारण,ग्रामीण आक्रमणों को आकर्षित करती होगी। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्य इतनी संख्या में नही मिले हैं कि यह माना जा सके कि सुदूर क्षेत्रों से हड्प्पाई क्षेत्र की किसी नगरपालिका पर कोई संगठित आक्रमण हुआ होगा। घोड़े के पुरातात्विक साक्ष्यों का अल्प अथवा नगण्य संख्या में पाया जाना, बाह्य आक्रमण द्वारा हड़प्पा सभ्यता के पतन को सीरे से नकारने के लिए पर्याप्त है।

   अंततः लंबी दूरी के व्यापार का विकास हुआ जैसा कि पूर्व वर्णित है। विलासितापूर्ण जीवन की चाह एवं उससे जनित आवश्यकताओं ने लंबी दूरी के व्यापार को प्रोत्साहित किया। उदाहरण के लिए चांदी जो एक बहुमूल्य धातु है, की प्राप्ति के लिए अफगानिस्तान के सुदूर क्षेत्रों तक हड़प्पाई व्यापारियों ने यात्राएं की। लंबी दूरी के व्यापार ने सामाजिक सम्बन्धों का दायरा विकसित किया। लोगों ने व्यापार के माध्यम से एक दूसरे के आचार-विचार को जाना,समझा,अपनाया होगा। इसका यह परिणाम हुआ होगा कि नगर-नियोजन एवं स्वच्छता, सभ्य होने की पहचान से जुड़ गए होंगे और ये सामान्य आचार-संहिता के अंग के रूप में सामने आए होंगे, जिनको एक नगरपालिका से दूसरी ने व्यापारियों के माध्यम से अपनाया होगा। 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण

हड़प्पा में अधिशेष एवं नगरीकरण
@सुनील सत्यम
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वरन एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों में पहुँचता था । वास्तव में ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।
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                       अतीत-मंथन
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*1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
*2- दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--
दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने के लिए नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों में हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी फसल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने में बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुताई करने में सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा में अधिशेष अन्न उत्पादन करने में सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुव्यवस्थित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व में आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप में अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा में राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य की संप्रभुता की सीमा में नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों की भी सीमा थी,इन्ही नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, ग्रामीण जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। इससे यह निष्कर्ष निकालना तार्किक एवं उचित रहेगा कि हड़प्पा कि राजसत्ता सबसे पहले नगर-पालिकाओं के रूप मे विकसित हुए।हड़प्पा, मोहंजोदड़ों, धोलावीरा,राखीगढ़ी ,लोथल आदि इस सभ्यता कि प्रतिनिधि नगर-पालिकाएं थी। यह इस तथ्य से भी प्रमाणित होता है कि इन सभी नगर-पालिकाओं मे समान नागरिक सुविधाओं जैसे सुनियोजित नगरीकरण, चौड़ी सड़के, व्यवस्थित जल निकासी आदि एक समान प्रतिरूप मे विकसित हो पाई जिनका ग्रामीण अधिवासों मे अभाव था क्योंकि ग्राम पंचायत जैसी व्यवस्था उस सामी टीके विकसित नहीं हुई थी अथवा विकास कि शैशवावस्था में थी। 
दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हें भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों में जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव में आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
       इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों में जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों में पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण लोग, अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी में विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा में मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों में मजदूरी भी करते होंगे। नगरों में श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम की मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न की समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामान्यतः बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था।  






मंगलवार, 12 सितंबर 2017

हड़प्पा सभ्यता एवं कृषि अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण

अधिशेष का प्रयोग एवं वितरण
कृषि अधिशेष उत्पादन की हड़प्पाई नगरीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। कृषि अधिशेष ने गैर-कृषक वर्गों के उदय मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि अधिशेष उत्पादन ने निश्चय ही अनेक वर्गों जैसे शिल्पी,कुम्हार एवं अन्य गैर उत्पादक वर्गों यथा सफाई कर्मी,पुरोहित,नगर प्रहरियों आदि को आजीविका आधार प्रदान किया । लेकिन जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है कि यह अधिशेष उत्पादन बलपूर्वक, ग्रामीणों से नही उगाहा जाता था वर्ण एक स्वाभाविक आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से नगरों ने पहुँचता था । वास्तव मे ग्रामीण कृषि अधिशेष उत्पादन को दो प्रकार से प्रयोग करते थे।

                                             कृषि अधिशेष
* भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण
* दैनिक अवश्यकता की कृषि एवं गैर-कृषि वस्तुओं के विनिमय हेतु खर्च करने में--नगर मे स्वयं जाकर वस्तु विनिमय तथा फेरि वालों से गाँव मे ही वस्तु विनिमय में खर्च।
1- भविष्य की खाद्य अवश्यकताओं के लिए संग्रहण:- हड़प्पा सभ्यता के
अधिकांश स्थलों से कोष्ठागार मिले हैं। नगरों मे हड़प्पा एवं मोहनजोदडों की भांति कुछ बड़े अन्नागार प्राप्त हुए हैं। ग्रामीण स्थलों से घरों के अंदर माठ,कुठले एवं भूमिगत कोठियों के पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। अभी भी देश के सुदूर  ग्रामीण क्षेत्रों मे लोग खाध्यान्न भंडारण के लिए इनका प्रयोग करते हैं। ग्रामीण हड़प्पावासी अपनी खाध्यान्न संबंधी भविष्य की जरूरतों के लिए अधिशेष उत्पादन का कुछ भाग संग्रहीत करके रखते थे ताकि वे आगामी एफ़एसएल तक अपनी भोजन संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें। अभी तक किसी हड़प्पाई स्थल से धातु निर्मित हल का फाल प्राप्त होने के समाचार नही मिले हैं।  इससे यह सामान्य निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हड़प्पावासी लकड़ी के बने हल का प्रयोग करते थे।चोलिस्तान के कई स्थलों तथा बानावाली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं ।  अनेक मुहरों पर पर किया गया रेखांकन  तथा मृणमूर्तियाँ संकेत करती हैं कि हड़प्पावासी वृषभ(बैल) से परिचित थे तथा हल जोतने मे बैलों का प्रयोग करते थे। आरंभिक हड़प्पाई स्तर से संबन्धित कालीबंगा से हल से जुते हुए  खेत का साक्ष्य भी हल द्वारा जुताईं का प्रमाण है। पुरातात्विक साक्ष्य एक साथ दो फसल उगाने का इशारा करते हैं लेकिन यह संदिग्ध है और इसे साक्ष्यों से आधार पर प्रमाणित करना कठिन है।
 लकड़ी का हल गहरी जुटाई करने मे सक्षम नही  था। अतः यह मानना तर्क संगत नही होगा कि हड़प्पाई भारी मात्रा मे अधिशेष अन्न उत्पादन मे सफल रहे हों। कम से कम यह अधिशेष इतना तो नहीं था कि इसके आधार पर एक विशाल  एवं सुस्थापित स्थायी राजसत्ता अस्तित्व मे आ सके । किसी स्थायी या अस्थाई सेना के अस्तित्व के साक्ष्यों का अभाव भी इस बात को प्रमाणित करता है कि कृषि अधिशेष बहुत ज्यादा नही था। राज्य इतना सक्षम अभी तक नही हुआ था कि वह वेतन के रूप मे अनाज देकर सेना का रख रखाव कर सकें । सेना के साथ ही राजसत्ता के अन्य तत्वों को भी भुगतान करना पड़ता है, जो संभव प्रतीत नही होता है। अतः यह माना जा सकता है कि हड़प्पा मे राज्य-तत्व सीमित था। उसका विस्तार एवं प्रभुसत्ता अत्यंत सीमित था। नगरों के बाहर ग्रामीण क्षेत्र किसी भी राज्य कि संप्रभुता कि सीमा मे नहीं थे। नगरों के शासक सिर्फ नगर प्रमुख थे।नगरीय सीमा ही उनके आदेशों कि भी सीमा थी,इनहि नगरों के वे संप्रभु शासक थे। ग्राम उनकी सत्ता से बाहर थे, गरमीन जीवन राजकीय आदेशों से अछूता रहा होगा। 
दैनिक आवश्यकता कि वस्तुओं के विनिमय के लिए अधिशेष का प्रयोग;-
कृषि अधिशेष के एक भाग का प्रयोग हड़प्पावासी अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते थे। उन्हे भोजन पकाने के लिए विभिन्न प्रकार के मृदभांड जैसे हांडी,मिट्टी की थाली या प्लेट,अन्य संग्रहण पात्रों-माठ, बड़े जार, मृणमूर्तियों, बच्चों के लिए खिलौनों एवं अन्य वस्तुओं की जरूरत पड़ती थी।अपनी इन आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ग्रामीण समुदाय कृषि अधिशेष के साथ विनिमय करता था। यह विनिमय वह दो प्रकार से करता था:-:-
1- नगरों मे जाकर स्वयं विनिमय
2- गाँव मे आने वाले फेरीवालों से वस्तु विनिमय
इस प्रकार ग्रामों से कृषि अधिशेष शहरों मे जाने की  प्रक्रिया द्विमार्गी थी। वर्ष के अंत तक अधिशेष का अधिकांश भाग नगरों मे पहुँच जाता था। इसी अधिशेष के बल पर अनेक हड़प्पाई नगर फले-फूले और उनकी "नगर पालिकाएं" विकसित हुई।
नगरों द्वारा ग्रामीणों से अधिशेष प्राप्ति की यह ऐसी प्रक्रिया थी जिसके लिए किसी हथियार या आक्रमण की जरूरत नही थी। इतना ही नहीं ग्रामीण अधिशेष के जिस भाग को अपनी भविष्य की खाद्यान्न आवश्यकताओं के लिए संग्रहीत करके रखते थे, वह भी कई बार मजबूरी मे विनिमय हेतु खर्च करना पड़ जाता था और बाकी के दिन कंद-मूल पर अथवा शिकार करके जीवन निर्वाह करना पड़ता होगा। इसके अतिरिक्त हड़प्पा मे मिले श्रमिक आवास के पुरातात्विक साक्ष्य इस बात का भी संकेत करते है कि अधिशेष कृषि  उत्पादन के अगली फसल से पहले समाप्त हो जाने पर ग्रामीण लोग समीपी नगरों मे मजदूरी भी करते होंगे। नगरों मे श्रम करने वाले अधिकांश श्रमिक ग्रामीण जन ही रहे होंगे। मौसम कि मार एवं समय से पहले अधिशेष खाद्यान्न कि समाप्ती ऐसे कारक थे जिनके कारण ग्रामीणों को जीवन निर्वाह के लिए मजदूरी का सहारा लेना पड़ता होगा। मजदूर सामनी बस्ती से बाहर रहते थे उनका जीवन काफी कठिन एवं श्रमसाध्य था। 

सोमवार, 6 मार्च 2017

संस्कृत सुभाषित के हिन्दी अर्थ हैं।

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संस्कृत सुभाषित के हिन्दी अर्थ हैं।

सुभाषित शब्द "सु" और "भाषित" के मेल से बना है जिसका अर्थ है "सुन्दर भाषा में कहा गया"। संस्कृत के सुभाषित जीवन के दीर्घकालिक अनुभवों के भण्डार हैं।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम्॥११॥


"ये मेरा है", "वह उसका है" जैसे विचार केवल संकुचित मस्तिष्क वाले लोग ही सोचते हैं। विस्तृत मस्तिष्क वाले लोगों के विचार से तो वसुधा एक कुटुम्ब है।

क्षणशः कणशश्चैव विद्यां अर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥१२॥


प्रत्येक क्षण का उपयोग सीखने के लिए और प्रत्येक छोटे से छोटे सिक्के का उपयोग उसे बचाकर रखने के लिए करना चाहिए, क्षण को नष्ट करके विद्याप्राप्ति नहीं की जा सकती और सिक्कों को नष्ट करके धन नहीं प्राप्त किया जा सकता।

अश्वस्य भूषणं वेगो मत्तं स्याद गजभूषणम्।
चातुर्यं भूषणं नार्या उद्योगो नरभूषणम्॥१३॥


तेज चाल घोड़े का आभूषण है, मत्त चाल हाथी का आभूषण है, चातुर्य नारी का आभूषण है और उद्योग में लगे रहना नर का आभूषण है।

क्षुध् र्तृट् आशाः कुटुम्बन्य मयि जीवति न अन्यगाः।
तासां आशा महासाध्वी कदाचित् मां न मुञ्चति॥१४॥


भूख, प्यास और आशा मनुष्य की पत्नियाँ हैं जो जीवनपर्यन्त मनुष्य का साथ निभाती हैं। इन तीनों में आशा महासाध्वी है क्योंकि वह क्षणभर भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती, जबकि भूख और प्यास कुछ कुछ समय के लिए मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं।

कुलस्यार्थे त्यजेदेकम् ग्राम्स्यार्थे कुलंज्येत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥१५॥


कुटुम्ब के लिए स्वयं के स्वार्थ का त्याग करना चाहिए, गाँव के लिए कुटुम्ब का त्याग करना चाहिए, देश के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और आत्मा के लिए समस्त वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

नाक्षरं मंत्रहीतं नमूलंनौधिम्।
अयोग्य पुरुषं नास्ति योजकस्तत्रदुर्लभः॥१६॥


ऐसा कोई भी अक्षर नहीं है जिसका मंत्र के लिए प्रयोग न किया जा सके, ऐसी कोई भी वनस्पति नहीं है जिसका औषधि के लिए प्रयोग न किया जा सके और ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसका सदुपयोग के लिए प्रयोग किया जा सके, किन्तु ऐसे व्यक्ति अत्यन्त दुर्लभ हैं जो उनका सदुपयोग करना जानते हों।

धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयत प्रजाः।
यस्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥१७॥


"धर्म" शब्द की उत्पत्ति "धारण" शब्द से हुई है (अर्थात् जिसे धारण किया जा सके वही धर्म है), यह धर्म ही है जिसने समाज को धारण किया हुआ है। अतः यदि किसी वस्तु में धारण करने की क्षमता है तो निस्सन्देह वह धर्म है।

आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषां अधिकोविशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥१८॥


आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्य और पशु दोनों ही के स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं (अर्थात् यदि केवल इन चारों को ध्यान में रखें तो मनुष्य और पशु समान हैं), केवल धर्म ही मनुष्य को पशु से श्रेष्ठ बनाता है। अतः धर्म से हीन मनुष्य पशु के समान ही होता है।

सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
यद्भूतहितमत्यन्तं एतत् सत्यं मतं मम्॥१९॥


यद्यपि सत्य वचन बोलना श्रेयस्कर है तथापि उस सत्य को ही बोलना चाहिए जिससे सर्वजन का कल्याण हो। मेरे (अर्थात् श्लोककर्ता नारद के) विचार से तो जो बात सभी का कल्याण करती है वही सत्य है।

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम्।
प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥२०॥


सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।

अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥२१॥

(वाल्मीकि रामायण)

हे लक्ष्मण! सोने की लंका भी मुझे नहीं रुचती। मुझे तो माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी अधिक प्रिय है।

मरणानतानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम्।
क्रियतामस्य संसकारो ममापेष्य यथा तव॥२२॥

(वाल्मीकि रामायण)

किसी की मृत्यु हो जाने के बाद उससे बैर समाप्त हो जाता है, मुझे अब इस (रावण) से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। अतः तुम अब इसका विधिवत अन्तिम संस्कार करो।

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥२३॥


बुद्धिमान व्यक्ति काव्य, शास्त्र आदि का पठन करके अपना मनोविनोद करते हुए समय को व्यतीत करता है और मूर्ख सोकर या कलह करके समय बिताता है।

तैलाद् रक्षेत् जलाद् रक्षेत् रक्षेत् शिथिल बंधनात्।
मूर्ख हस्ते न दातव्यं एवं वदति पुस्तकम्॥२४॥


एक पुस्तक कहता है कि मेरी तेल से रक्षा करो (तेल पुस्तक में दाग छोड़ देता है), मेरी जल से रक्षा करो (पानी पुस्तक को नष्ट कर देता है), मेरी शिथिल बंधन से रक्षा करो (ठीक से बंधे न होने पर पुस्तक के पृष्ठ बिखर जाते हैं) और मुझे कभी किसी मूर्ख के हाथों में मत सौंपो।

श्रोतं श्रुतनैव न तु कुण्डलेन दानेन पार्णिन तु कंकणेन।
विभाति कायः करुणापराणाम् परोपकारैर्न तु चंदनेन॥२५॥


कान की शोभा कुण्डल से नहीं बल्कि ज्ञानवर्धक वचन सुनने से है, हाथ की शोभा कंकण से नहीं बल्कि दान देने से है और काया (शरीर) चन्दन के लेप से दिव्य नहीं होता बल्कि परोपकार करने से दिव्य होता है।

भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती।
तस्यां हि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्॥२६॥


भाषाओं में सर्वाधिक मधुर भाषा गीर्वाणभारती अर्थात देवभाषा (संस्कृत) है, संस्कृत साहित्य में सर्वाधिक मधुर काव्य हैं और काव्यों में सर्वाधिक मधुर सुभाषित हैं।

उदारस्य तृणं वित्तं शूरस्त मरणं तृणम्।
विरक्तस्य तृणं भार्या निस्पृहस्य तृणं जगत्॥२७॥


उदार मनुष्य के लिए धन तृण के समान है, शूरवीर के लिए मृत्यु तृण के समान है, विरक्त के लिए भार्या तृण के समान है और निस्पृह (कामनाओं से रहित) मनुष्य के लिए यह जगत् तृण के समान है।

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन्।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते॥२८॥


राजत्व प्राप्ति और विद्वत्व प्राप्ति की किंचित मात्र भी तुलना नहीं हो सकती क्योंकि राजा की पूजा केवल उसके अपने देश में ही होती है जबकि विद्वान की पूजा सर्वत्र (पूरे विश्व में) होती है।

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चांगारः शीतः कृष्णायते करम्॥२९॥


दुर्जन, जो कि कोयले के समान होते हैं, से प्रीति कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि कोयला यदि गरम हो तो जला देता है और शीतल होने पर भी अंग को काला कर देता है।

चिन्तनीया हि विपदां आदावेव प्रतिक्रिया।
न कूपखननं युक्तं प्रदीप्त वान्हिना गृहे॥३०॥


जिस प्रकार से घर में आग लग जाने पर कुँआ खोदना आरम्भ करना युक्तिपूर्ण (सही) कार्य नहीं है उसी प्रकार से विपत्ति के आ जाने पर चिन्तित होना भी उपयुक्त कार्य नहीं है। (किसी भी प्रकार की विपत्ति से निबटने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।)

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्यणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मगाः॥३१॥


जिस प्रकार से सोये हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं चले जाते, सिंह को क्षुधा-शान्ति के लिए शिकार करना ही पड़ता है, उसी प्रकार से किसी कार्य की मात्र इच्छा कर लेने से वह कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, कार्य उद्यम करने से ही सिद्ध होता है।

स्थानभ्रष्टाः न शोभन्ते दन्ताः केशाः नखा नराः।
इति विज्ञाय मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत्॥३२॥


यदि मनुष्य के दांत, केश, नख इत्यादि अपना स्थान त्याग कर दूसरे स्थान पर चले जाएँ तो वे कदापि शोभा नहीं नहीं देंगे (अर्थात् मनुष्य की काया विकृति प्रतीत होने लगेगी)। इसी प्रकार से विज्ञजन के मतानुसार किसी व्यक्ति को स्वस्थान (अपना गुण, सत्कार्य इत्यादि) का त्याग नहीं करना चाहिए।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखम्॥३३॥


आलसी को विद्या कहाँ? (आलसी व्यक्ति विद्या प्राप्ति नहीं कर सकता।) विद्याहीन को धन कहाँ? (विद्याहीन व्यक्ति धन नहीं कमा सकता।) धनहीन को मित्र कहाँ? (धन के बिना मित्र की प्राप्ति नहीं हो सकती।) मित्रहीन को सुख कहाँ? (मित्र के बिना सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती।)

उदये सविता रक्तो रक्तशचास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महामेकरूपता॥३४॥

(महाभारत)

जिस प्रकार से सूर्य सुबह उगते तथा शाम को अस्त होते समय दोनों ही समय में लाल रंग का होता है (अर्थात् दोनों ही संधिकालों में एक समान रहता है), उसी प्रकार महान लोग अपने अच्छे और बुरे दोनों ही समय में एक जैसे एक समान (धीर बने) रहते हैं।

शान्तितुल्यं तपो नास्ति तोषान्न परमं सुखम्।
नास्ति तृष्णापरो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥३५॥


शान्ति जैसा कोई तप (यहाँ तप का अर्थ उपलब्धि समझना चाहिए) नहीं है, सन्तोष जैसा कोई सुख नहीं है (कहा भी गया है "संतोषी सदा सुखी), कामना जैसी कोई ब्याधि नहीं है और दया जैसा कोई धर्म नहीं है।

सर्वोपनिषदो गावः दोग्धाः गोपालनन्दनः।
पार्थो वत्सः सुधीः भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥३६॥


समस्त उपनिषद गाय हैं, श्री कृष्ण उन गायों के रखवाले हैं, पार्थ (अर्जुन) बछड़ा है जो उनके दूध का पान करता है और गीतामृत ही उनका दूध है। (अर्थात् समस्त उपनिषदों का सार गीता ही है।)

हंसो शुक्लः बको शुक्लः को भेदो बकहंसयो।
नीरक्षीरविवेके तु हंसो हंसः बको बकः॥३७॥


हंस भी सफेद रंग का होता है और बगुला भी सफेद रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? जिसमें दूध और पानी अलग कर देने का विवेक होता है वही हंस होता है और विवेकहीन बगुला बगुला ही होता है।

काको कृष्णः पिको कृष्णः को भेदो पिककाकयो।
वसन्तकाले संप्राप्ते काको काकः पिको पिकः॥३८॥


कोयल भी काले रंग की होती है और कौवा भी काले रंग का ही होता है फिर दोनों में क्या भेद (अन्तर) है? वसन्त ऋतु के आगमन होते ही पता चल जाता है कि कोयल कोयल होती है और कौवा कौवा होता है।

न चौर्यहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत व नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम॥४१॥


न तो इसे चोर चुरा सकता है, न ही राजा इसे ले सकता है, न ही भाई इसका बँटवारा कर सकता है और न ही इसका कंधे पर बोझ होता है; इसे खर्च करने पर सदा इसकी वृद्धि होती है, ऐसा विद्याधन सभी धनों में प्रधान है।

हर्तृ र्न गोचरं याति दत्ता भवति विस्तृता।
कल्पान्तेऽपि न या नश्येत् किमन्यद्विद्यया विना॥४२॥


जो चोरों दिखाई नहीं पड़ता, किसी को देने से जिसका विस्तार होता है, प्रलय काल में भी जिसका विनाश नहीं होता, विद्या के अतिरिक्त ऐसा अन्य कौन सा द्रव्य है?

विद्या नाम नरस्य कीर्तिर्तुला भाग्यक्षये चाश्रयो।
धेनुः कामदुधा रतिश्च विरहे नेत्रं तृतीयं च सा॥४३॥
सत्कारायतनं कुलस्य महिमा रत्नैर्विना भूषणम्।
तस्मादन्यमुपेक्ष्य सर्वविषयं विद्याधिकारं कुरु॥४४॥


विद्या मनुष्य की अनुपम कीर्ति है, भाग्य का नाश होने पर वह आश्रय देती है, विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या ही तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल की महिमा है, बिना रत्न का आभूषण है; इस लिए अन्य सब विषयों को छोडकर विद्या का अधिकारी बन!

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥४५॥


विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता प्राप्त होती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म की प्राप्ति होती है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

विद्याविनयोपेतो हरति न चेतांसि कस्य मनुजस्य।
कांचनमणिसंयोगो नो जनयति कस्य लोचनानन्दम्॥४६॥


विद्यावान और विनयी पुरुष किस मनुष्य के चित्त को नहीं हरते? सुवर्ण और मणि का संयोग किसकी आँखों को सुख नहि देता? (अर्थात् विद्या और विनय का संयोग सोने और मणि के संयोग के समान है।)

विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्।
कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्॥४७॥


कुरुप का रुप विद्या है, तपस्वी का रुप क्षमा है, कोकिला का रुप स्वर है, और स्त्री का रुप पातिव्रत्य है ।

कुत्र विधेयो यत्नः विद्याभ्यासे सदौषधे दाने।
अवधीरणा क्व कार्या खलपरयोषित्परधनेषु॥४८॥


यत्न किस के लिए करना चाहिए? विद्याभ्यास, सदौषध और परोपकार के लिए। अनादर किसका करना ? दुर्जन, परायी स्त्री और परधन का।

रूपयौवनसंपन्ना विशाल कुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥४९॥


रुपसम्पन्न, यौवनसम्पन्न और विशाल कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी विद्याहीन होने पर, सुगंधरहित केसुड़े के फूल की भाँति, शोभा नहीं देता।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥५०॥


अपने बालक को न पढ़ाने वाले माता व पिता अपने ही बालक के शत्रु हैं, क्योंकि हंसो के बीच बगुले की भाँति, विद्याहीन मनुष्य विद्वानों की सभा में शोभा नहीं देता।

दुर्जनः प्रियवादीति नैतद् विश्वासकारणम्।
मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्॥३९॥


दुर्जन व्यक्ति यदि प्रिय (मधुर लगने वाली) वाणी भी बोले तो भी उसका विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि उसे जबान पर (प्रिय वाणी रूपी) मधु होने पर भी हृदय में हलाहल (विष) ही भरा होता है।

सर्पदुर्जनयोर्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशती कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे॥४०॥


(यदि साँप और दुष्ट की तुलना करें तो) साँप दुष्ट से अच्छा है क्योंकि साँप कभी-कभार ही डँसता है पर दुष्ट पग-पग पर (प्रत्येक समय) डँसता है।

वरं एको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि।
एकश्चंद्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च॥५१॥


सौ मूर्ख पुत्र होने की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र होना श्रेष्ठ है, अन्धकार का नाश केवल एक चन्द्रमा ही कर देता है पर तारों के समूह नहीं कर सकते।

विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेष धनं मतिः।
परलोके धनं धर्मः शीलं सर्वत्र वै धनम्॥५२॥


परदेस में रहने के लिए विद्या ही धन है, व्यसनी व्यक्ति के लिए चातुर्य ही धन है, परलोक की कामना करने वाले के लिए धर्म ही धन हैं किन्तु शील (सदाचार) सर्वत्र (समस्त स्थानों के लिए) ही धन है।

अल्पानामपि वस्तूनां संहति कार्यसाधिका।
तृणैर्गुत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥५३॥


इस सुभाषित में यह सन्देश दिया गया है कि छोटी-छोटी बातों के समायोजन से बड़ा कार्य सिद्ध हो जाता है जैसे कि तृणों को जोड़कर बनाई गई डोर हाथी को बाँध देता है।

अतिपरिचयादवज्ञा संततगमनात् अनादरो भवति।
मलये भिल्ला पुरन्ध्री चन्दनतरुकाष्ठमं इन्धनं कुरुते॥५४॥


अतिपरिचय (बहुत अधिक नजदीकी) अवज्ञा और किसी के घर बार बार जाना अनादर का कारण बन जाता है जैसे कि मलय पर्वत की भिल्लनी चंदन के लकड़ी को ईंधन के रूप में जला देती है।

इसी बात को कवि वृन्द ने इस प्रकार से कहा हैः

अति परिचै ते होत है, अरुचि अनादर भाय।
मलयागिरि की भीलनी चन्दन देति जराय॥


सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात् क्रूरतरः खलः।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च दुर्जनः केन शाम्यति॥५५॥


साँप भी क्रूर होता है और दुष्ट भी क्रूर होता है किन्तु दुष्ट साँप से अधिक क्रूर होता है क्योंकि साँप के विष का तो मन्त्र से शमन हो सकता है किन्तु दुष्ट के विष का शमन किसी प्रकार से नहीं हो सकता।

लालयेत् पंच वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्॥५६॥


पाँच वर्ष की अवस्था तक पुत्र का लाड़ करना चाहिए, दस वर्ष की अवस्था तक (उसी की भलाई के लिए) उसे ताड़ना देना चाहिए और उसके सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त कर लेने पर उससे मित्रवत व्यहार करना चाहिए।

सम्पूर्ण कुंभो न करोति शब्दं अर्धोघटो घोषमुपैति नूनम्।
विद्वान कुलीनो न करोति गर्वं गुणैर्विहीना बहु जल्पयंति॥५७॥


जिस प्रकार से आधा भरा हुआ घड़ा अधिक आवाज करता है पर पूरा भरा हुआ घड़ा जरा भी आवाज नहीं करता उसी प्रकार से विद्वान अपनी विद्वता पर घमण्ड नहीं करते जबकि गुणविहीन लोग स्वयं को गुणी सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

मूर्खा यत्र न पूज्यते धान्यं यत्र सुसंचितम्।
दम्पत्यो कलहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥५८॥


जहाँ पर मूर्खो की पूजा नहीं होती (अर्थात् उनकी सलाह नहीं मानी जाती), धान्य को भलीभाँति संचित करके रखा जाता है और पति पत्नी के मध्य कलह नहीं होता वहाँ लक्ष्मी स्वयं आ जाती हैं।

मृगाः मृगैः संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरंगास्तुरंगैः।
मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेष सख्यम्॥५९॥


हिरण हिरण का अनुरण करता है, गाय गाय का अनुरण करती है, घोड़ा घोड़े का अनुरण करता है, मूर्ख का अनुरण करता है और बुद्धिमान का अनुरण करता है। मित्रता समान गुण वालों में ही होती है।

शतेषु जायते शूरः सहस्त्रेषु च पण्डितः।
वक्ता दशसहस्त्रेष दाता भवति वान वा॥६०॥


सौ लोगों में एक शूर पैदा होता है, हजार लोगों में एक पण्डित पैदा होता है, दस हजार लोगों में एक वक्ता पैदा होता है और दाता कोई बिरला ही पैदा होता है।

अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यावज्जीवं च विद्यया॥६१॥

अन्न का दान परम दान है और विद्या का दान भी परम दान दान है किन्तु दान में अन्न प्राप्त करने वाली कुछ क्षणों के लिए ही तृप्ति प्राप्त होती है जबकि दान में विद्या प्राप्त करने वाला (अपनी विद्या से आजीविका कमा कर) जीवनपर्यन्त तृप्ति प्राप्त करता है।

इस पर अंग्रेजी में भी एक कहावत इस प्रकार से हैः

“Give a man a fish; you have fed him for today. Teach a man to fish; and you have fed him for a lifetime”

मूर्खस्य पंच चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
क्रोधस्य दृढ़वादश्च परवाक्येषवनादरः॥६२॥

मूर्खों के पाँच लक्षण होते हैं - गर्व (अहंकार), दुर्वचन (कटु वाणी बोलना), क्रोध, कुतर्क और दूसरों के कथन का अनादर।

नमन्ति फलिनो वृक्षाः नमन्ति गुणिनो जनाः।
शुष्ककाष्ठश्च मूर्खश्च न नमन्ति कदाचन॥६३॥

जिस प्रकार से फलों से लदी हुई वृक्ष की डाल झुक जाती है उसी प्रकार से गुणीजन सदैव विनम्र होते हैं किन्तु मूर्ख उस सूखी लकड़ी के समान होता है जो कभी नहीं झुकता।

वृश्चिकस्य विषं पृच्छे मक्षिकायाः मुखे विषम्।
तक्षकस्य विषं दन्ते सर्वांगे दुर्जनस्य तत्॥६४॥

बिच्छू का विष पीछे (उसके डंक में) होता है, मक्षिका (मक्खी) का विष उसके मुँह में होता है, तक्षक (साँप) का विष उसके दाँत में होता है किन्तु दुर्जन मनुष्य के सारे अंग विषैले होते हैं।

विकृतिं नैव गच्छन्ति संगदोषेण साधवः।
आवेष्टितं महासर्पैश्चनदनं न विषायते॥६५॥

जिस प्रकार से चन्द के वृक्ष से विषधर के लिपटे रहने पर भी वह विषैला नहीं होता उसी प्रकार से संगदोष (कुसंगति) होने पर भी साधुजनों के गुणों में विकृति नहीं आती।

घटं भिन्द्यात् पटं छिनद्यात् कुर्याद्रासभरोहण।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥६६॥

घड़े तोड़कर, कपड़े फाड़कर या गधे पर सवार होकर, चाहे जो भी करना पड़े, येन-केन-प्रकारेण प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहिए। (ऐसा कुछ लोगों का सिद्धान्त होता है।)

तृणानि नोन्मूलयति प्रभन्जनो मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः।
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं महान्महत्स्वेव करोति विक्रम॥६७॥

जिस प्रकार से प्रचण्ड आंधी बड़े बड़े वृक्षों को जड़ से उखाड़ देता है किन्तु छोटे से तृण को नहीं उखाड़ता उसी प्रकार से पराक्रमीजन अपने बराबरी के लोगों पर ही पराक्रम प्रदर्शित करते हैं और निर्बलों पर दया करते हैं।

प्रदोषे दीपकश्चन्द्रः प्रभाते दीपको रविः।
त्रैलोक्ये दीपको धर्मः सुपुत्र कुलदीपकः॥६८॥

शाम का दीपक चन्द्रमा होता है, सुबह का दीपक सूर्य होता है, तीनों लोकों का दीपक धर्म होता है और कुल का दीपक सुपुत्र होता है।

अनारम्भो हि कार्याणां प्रथमं बुद्धिलक्षणम्।
प्रारब्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम्॥६९॥

(आलसी लोगों की) बुद्धि के दो लक्षण होते हैं - प्रथम कार्य को आरम्भ ही नहीं करना और द्वितीय भाग्य के भरोसे बैठे रहना।

परोपदेशवेलायां शिष्टाः सर्वे भवन्ति वै।
विसमरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुस्थिते॥७०॥

दूसरों के कष्ट में पड़ने पर हम उन्हें जो उपदेश देते हैं, स्वयं कष्ट में पड़ने पर उन्हीं उपदेशों को भूल जाते हैं।

गुणवन्तः क्लिश्यन्ते प्रायेण भवन्ति निर्गुणाः सुखिनः।
बन्धनमायान्ति शुकाः यथेष्टसंचारिणः काकाः॥७१॥


गुणवान को क्लेश भोगना पड़ता है और निर्गुण सुखी रहता है जैसे कि तोता अपनी सुन्दरता के गुण के कारण पिंजरे में डाल दिया जाता है किन्तु कौवा आकाश में स्वच्छन्द विचरण करता है।

नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥७२॥


विद्या के समान कोई चक्षु (आँख) नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग (वासना, कामना) के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सुहृज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥७३॥


मनुष्य के धनहीन हो जाने पर पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी आदि सभी उसका त्याग कर देते हैं और उसके धनवान बन जाने पर वे सभी पुनः उसके आश्रय में आ जाते हैं। इस लोक में धन ही मनुष्य का बन्धु है।

कुसुमं वर्णसंपन्नं गन्धहीनं न शोभते।
न शोभते क्रियाहीनं मधुरं वचनं तथा॥७४॥


जिस प्रकार से गन्धहीन होने पर सुन्दर रंगों से सम्पन्न पुष्प शोभा नहीं देता, उसी प्रकार से अकर्मण्य होने पर मधुरभाषी व्यक्ति भी शोभा नहीं देता।

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥७५॥


जिस व्यक्ति के भीतर उत्साह होता है वह बहुत बलवान होता है। उत्साह से बढ़कर कोई अन्य बल नहीं है, उत्साह ही परम् बल है। उत्साही व्यक्ति के लिए इस संसार में कुछ भी वस्तु दुर्लभ नहीं है।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यांविहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥७६॥


जिस प्रकार से अन्धे व्यक्ति के लिए दर्पण कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार से विवेकहीन व्यक्ति के लिए शास्त्र भी कुछ नहीं कर सकते।

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि कांचनम्॥७७॥


विष से भी मिले तो अमृत को स्वीकार करना चाहिए, छोटे बच्चे से भी मिले तो सुभाषित (अच्छी सीख) को स्वीकार करना चाहिए, शत्रु से भी मिले तो अच्छे गुण को स्वीकार करना चाहिए और गंदगी से भी मिले तो सोने को स्वीकार करना चाहिए।

मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः।
जातौ जातौ नवाचारा नवा वाणी मुखे मुखे॥७८॥


भिन्न-भिन्न मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न मति (विचार) होती है, भिन्न-भिन्न सरोवर में भिन्न-भिन्न प्रकार का पानी होता है, भिन्न-भिन्न जाति के लोगों के भिन्न-भिन्न जीवनशैलियाँ (परम्परा, रीति-रिवाज) होती हैं और भिन्न-भिन्न मुखों से भिन्न-भिन्न वाणी निकलती है।

नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभारणं गुनः।
गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥७९॥


मनुष्य का अलंकार (गहना) रूप होता है, रूप का अलंकार (गहना) गुण होता है, गुण का अलंकार (गहना) ज्ञान होता है और ज्ञान का अलंकार (गहना) क्षमा होता है।

अपूर्व कोपि कोशोयं विद्यते तव भारति।
व्ययतो वृद्धमायाति क्षयमायाति संचयात्॥८०॥


हे माता सरस्वती! आपका कोश (विद्या) बहुत ही अपूर्व है जिसे खर्च करने पर बढ़ते जाता है और संचय करने पर घटने लगता है।

इसी बात को इस प्रकार से भी कहा गया हैः

सरस्वती के भण्डार की बड़ी अपूरब बात।
ज्यौं खरचे त्यौं त्यौं बढ़े बिन खरचे घट जात॥


व्यसने मित्रपरीक्षा शूरपरीक्षा रणाङ्गणे भवति।
विनये भृत्यपरीक्षा दानपरीक्षाच दुर्भिक्षे॥८१॥


खराब समय आने पर मित्र की परीक्षा होती है, युद्धस्थल में शूरवीर की परीक्षा होती है, नौकर की परीक्षा विनय से होती है और दान की परीक्षा अकाल पड़ने पर होती है।

राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः।
भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पापं गुरस्था॥८२॥


राष्ट्र के अहित का जिम्मेदार राजा का पाप होता है, राजा के पाप का जिम्मेदार उसका पुरोहित (मन्त्रीगण) होता है, स्त्री के गलत कार्य का जिम्मेदार उसका पति होता है और शिष्य के पाप का जिम्मेदार गुरु होता है।

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनम्॥८३॥


ज्ञान यदि पुस्तक में ही रहे (अर्थात् उसे पढ़ा न जाए) और स्वयं का धन यदि किसी अन्य के हाथों में हो तो आवश्यकता पड़ने पर उस ज्ञान और धन का उपयोग नहीं नहीं किया जा सकता।

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमाः मामिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥८४॥


निम्न वर्ग का व्यक्ति केवल धन की इच्छा रखता है, मध्यम वर्ग का व्यक्ति धन और मान दोनों की ही इच्छा रखता है और उत्तम वर्ग का व्यक्ति केवल मान-सम्मान की इच्छा रखता है। मान-सम्मान का धन से अधिक महत्व होता है।

अतितृष्णा न कर्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत्।
शनैः शनैश्च भोक्व्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम्॥८५॥


बहुत अधिक इच्छाएँ करना सही नहीं है और इच्छाओं का त्याग कर देना भी सही नहीं है। अपने उपार्जित (कमाए हुए) धन के अनुरूप ही इच्छा करना चाहिए वह भी एक बार में नहीं बल्कि धीरे धीरे।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि आज का बाजारवाद हमें उपरोक्त सीख से उल्टा करने की ही प्रेरणा देता है, बाजारवादद के कारण ही एक बार में ही अनेक और अपने द्वारा कमाए गए धन से अधिक इच्छा करके अपने सामर्थ्य से अधिक का सामान, वह भी विलासिता लेने को हम उचित समझने लगे हैं, भले ही उसके लिए हमें कर्ज में डूब जाना पड़े।

वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवाऽपि च॥८६॥


समुद्र में हुई वर्षा का कोई मतलब नहीं होता, भरपेट खाकर तृप्त हुए व्यक्ति को भोजन कराने का कोई मतलब नहीं होता, धनाढ्य व्यक्ति को दान देने का कोई मतलब नहीं होता और सूर्य के प्रकाश में दिया जलाने का कोई मतलब नहीं होता।

पबन्ति नद्यः स्वयं एव न अम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
न अदन्ति सस्य खलु वारिवाहा परोपकाराय सतां विभतयः॥८७॥


नदी स्वयं के जल को नहीं पीती, वृक्ष स्वयं के फल को नहीं खाते और बादल अपने द्वारा पानी बरसा कर पैदा किए गए अन्न को नहीं खाते। सज्जन हमेशा परोपकार ही करते हैं।

इसी को रहीम कवि ने इस प्रकार से कहा हैः

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

महाजनस्य संसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
पद्मपत्रस्थितं तोयं धत्ते मुक्ताफलश्रियम्॥८८॥


महान व्यक्तियों की संगति किसे उन्नति प्रदान नहीं करती? (अर्थात् महान व्यक्तियों की संगति से उन्नति ही होती है।) कमल के फूल पर पानी की बूंद मोती के समान दिखने लगता है (अर्थात् कमल की संगत से पानी मोती बन जाता है।)

स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥८९॥


उपदेश देकर किसी के स्वभाव को बदला नहीं जा सकता, पानी को कितना भी गरम करो, कुछ समय बाद वह फिर से ठंडा हो ही जाता है।

दानेन तुल्यो विधिरास्ति नान्यो लोभोच नान्योस्ति रिपुः पृथिव्यां।
विभूषणं शीलसमं च नान्यत् सन्तोषतुल्यं धमस्ति नान्य्॥९०॥


दान के समान अन्य कोई अच्छा कर्म नहीं है, लोभ के समान इस पृथ्वी पर कोई अन्य शत्रु नहीं है, शील के समान कोई गहना नहीं है और सन्तोष के समान कोई धन नहीं है।

परोऽपि हितवान् बन्धुः बन्धुरप्यहितः परः।
अहितो देहजो व्याधिः हितमारण्यमौषधम्॥९१॥
 (हितोपदेश)

व्याधियाँ (बीमारियाँ) हमारे शरीर के भीतर रहते हुए भी हमारा बुरा करती हैं और औषधियाँ (जड़ी-बूटियाँ) हमसे दूर पेड़-पौधों में में रहकर भी हमारा भला करती हैं (अर्थात् व्याधियाँ हमारे दुश्मन हैं और औषधियाँ मित्र)। इसी प्रकार से जिनसे हमारा रक्त का सम्बन्ध अर्थात् किसी प्रकार की रिश्तेदार न हो किन्तु वह हमारा हित करे तो वे अपने होते हैं और यदि रिश्तेदार होकर भी कोई हमारा अहित करे तो वह पराया होता है।

अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे।
पावको लौहसंगेन मुद्गरैरभिताड्यते॥९२॥


दुष्ट के संग रहने पर कदम कदम पर अपमान होता है। पावक (अग्नि) जब लोहे के साथ होता है तो उसे घन से पीटा जाता है।

चिता चिन्तासम ह्युक्ता बिन्दुमात्र विशेषतः।
सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥९३॥


चिता और चिंता में मात्र एक बिन्दु (अनुस्वार) का ही फर्क है किन्तु दोनों ही एक समान है, जो जीते जी जलाता है वह चिंता है और जो मरने के बाद (निर्जीव) को जलाता है वह चिता है।

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्।
वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य धीरस्य॥९४॥


अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले धीर व्यक्ति के लिए यह वसुधा (पृथ्वी) एक बगिया के समान होता है (जब चाहे घूम कर जी बहला लो), समुद्र एक नहर के समान होता है (जब चाहे तैर कर पार कर लो), पाताल लोक एक मनोरंजन स्थल (पिकनिक स्पॉट) के समान होता है (जब जाहे जाकर पिकनिक मना लो) और सुमेरु पर्वत एक चींटी के घर के समान होता है (जब चाहे चोटी पर चढ़ जाओ)। (अतः मनुष्य को दृढ़प्रतिज्ञ एवं धीर-गम्भीर होना चाहिए।)

येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भूविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥९५॥


विद्या, तप (कठिन परिश्रम कर पाने की योग्यता), दानशीलता, शील, गुण तथा धर्म से विहीन व्यक्ति मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भार के समान है, वह मनुष्य के रूप में पशु ही है।

माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः॥९६॥


माता, पिता और मित्र तीनों ही स्वभावतः ही हमारे हित के लिए सोचते हैं, वे हमारे हित करने के बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते। इन तीनों के सिवाय अन्य लोग यदि हमारे हित की सोचते हैं तो वे उसके बदले में हमसे कुछ न कुछ अपेक्षा भी रखते हैं।

वदनं प्रसादसदनं सदयं हृदयं सुधामुचो वाचः।
करणं परोपकरणं येषां केषां न ते वन्द्याः॥९७॥


सदैव प्रसन्न-वदन (हँसमुख), हृदय में दया की भावना रखने वाले, अमृत के समान मीठे वचन बोलने वाले तथा परोपकार में लिप्त रहने वाले व्यक्ति भला किसके लिए वन्दनीय नहीं होगा?

गर्वाय परपीड़ाय दुर्जस्य धनं बलम्।
सज्जनस्य दानाय रक्षणाय च ते सदा॥९८॥


दुर्जन (दुष्ट) का धन और बल गर्व (घमण्ड) तथा दूसरों को पीड़ा पहुँचाना होता है और दान एवं (निर्बलों की) रक्षा करना सज्जन का।

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः।
चित्ते वाचि क्रियायां च साधुनामेकरूपता॥९९॥


जो चित्त (मन) में हो वही वाणी से प्रकट होना चाहिए और जो वाणी से प्रकट हो उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए। जिनके चित्त, वाणी और कर्म में एकरूपता होती है वही साधुजन होते हैं।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति स्वयं तिष्टन्ति चातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुष इव॥१००॥


वृक्ष स्वयं सूर्य के प्रखर ताप को सहन करके दूसरों को छाया प्रदान करते हैं तथा उनके फल भी दूसरों के उपयोग के लिए होते हैं, वृक्ष के समान सत्पुरुष भला कौन है?