भगवाध्वज इस देश की सांस्कृतिक पताका है और मुझे इस पर गर्व है।
भगवाध्वज के सम्मान का अर्थ कदापि यह नहीं है कि इसका सम्मान करने वाले राष्ट्रीयध्वज का सम्मान नहीं करते है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भगवाध्वज को अपना "गुरु" मानता है ठीक वैसे ही जैसे सिख पंथ "श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब' को मानता है।
जिस प्रकार सिख पंथ द्वारा "श्रीगुरु ग्रन्थ साहिब" के सम्मान का अर्थ यह नहीं है कि सिख संविधान का सम्मान नहीं करते हैँ, ठीक उसी प्रकार संघ द्वारा भग्वाध्वज के सम्मान का अर्थ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान नहीं है।
भगवाध्वज देश का सांस्कृतिक राष्ट्रीय ध्वज है तो तिरंगा संवैधानिक राष्ट्रीयध्वज, भगवा हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक है तो तिरंगा हमारे स्वाधीनता संघर्ष और हमारी राजनितिक अस्मिता का प्रतीक है..!
शनिवार, 9 अप्रैल 2016
भगवा मेरी शान,तिरंगा मेरी जान
वनगुर्जर बहन सफुरा कसाना और भाई करीम लोढ़ा की दास्तां...!
वनगुर्जर बहन सफुरा कसाना और भाई करीम लोढ़ा की दास्तां...!
--------------------------@सुनील सत्यम
सहारनपुर से वाया मिर्ज़ापुर पौंटा साहिब जाने के मार्ग में प्राचीन टिमली रियासत पड़ती है।दर्रारीट (धर्मावाला) चेकपोस्ट से ही उत्तराखंड राज्य शुरू हो जाता है।यूँ कहिये कि मिर्ज़ापुर(सहारनपुर)से थोडा आगे चलते ही हिमालय की शिवालिक श्रृंखला शुरू हो जाती है।यहाँ से आगे टिमली गाँव पड़ता है।टिमली पूर्व में एक गुर्जर रियासत थी जिसका सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा भारतीय गणराज्य में सम्मिलन कर दिया गया था।
दर्रारीट चेकपोस्ट पार करके पचास कदम की दूरी पर ही एक खोल में वनगुर्जरों के करीब चार परिवार रहते हैं,इनमे से एक परिवार है भाई करीम लोधा का। करीम, लोधा गौत्र के वनगुर्जर है तो उनकी पत्नी सफूरा, कसाना गौत्र की है।करीम ने बताया कि माँ और पिता,दोनों के गौत्रों का विवाह के समय बचाव किया जाता है।ऐसा न करने वाले लोगों को हमारी जातीय पंचायत जाति से बहिष्कृत कर देती है।करीम के विवाह के समय भी उनके अपने गौत्र लोधा और मातृगौत्र बनयाने का बचाव किया गया था। सभी वनगुर्जर पूर्णतः शाकाहारी है।बक़रीद के समय भी अंडा तक नहीं खाते हैं।मीठी ईद ही मनाते है।
करीम के संघर्ष की दास्ताँ बड़ी कठिनाइयों से भरी है।गत वर्ष किसी अज्ञात बीमारी से करीम की सभी गाय-भैसों की मौत हो गई जिससे उन्हें करीब एक लाख रुपये का नुकसान उठाना पड़ा।उसके पशु बच सकते थे यदि उन्हें तत्काल चिकित्सा सेवा मिल जाती लेकिन जंगल में पशु तो क्या मनुष्यों के लिए भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है।पशुओं की अचानक मौत ने करीम परिवार की कमर तोड़ दी।आय का कोई अन्य स्रौत नहीं था,परिवार भूखों मरने के कगार पर आ गया तो करीम ने राज-मिस्त्री का काम सीखा।शुरुआत में बहुत कम मजदूरी मिलती थी लेकिन अब ₹ 500 प्रतिदिन मजदूरी मिल जाती है महीने में औसतन 12 से 15 दिन काम मिलता है।उसी से परिवार चलाना पड़ता है।
"यह क्षेत्र उत्तराखंड राज्य में आता है।सरकारी तौर पर कोई मदद नहीं मिलती है।स्थानीय विधायक ने इन्हें एक सोलर लाइट जरूर दी है"
करीम ने बताया कि हमारे लगभग 700-800 वोट है लेकिन फिर भी कोई हमारी सुध नहीं लेता है।
कभी भी जंगली हाथी आ जाते है जो डेरे को काफी नुकसान पहुंचा देते है,जिंदगी पुनः शुरू करनी पडती है। करीम कभी पढाई नहीं कर पाये है।सफूरा भी पढ़ी लिखी नहीं है।कारण है कि यह पर्वतीय जंगली इलाके में रहते है जहाँ शिक्षा व्यवस्था नहीं है।लेकिन करीम और सफूरा अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते है।इनकी 3 बेटियां है जिनमे सबसे बड़ी का नाम आमना है जो कक्षा 4 में पढ़ती है।उससे छोटी फातिमा है जो कक्षा 2 में है तथा तीसरी ने अभी स्कूल जाना शुरू नहीं किया है।
करीम अपने विधायक और सांसद का नाम नहीं जानते है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का नाम उन्होंने काफी सुना है।पूछने पर करीम ने बताया कि मोदी जी अच्छा भाषण देते है और वह काम भी बहुत अच्छे कर रहे है लेकिन अफसर लोग हम गरीबों तक उन अच्छे कामों को नहीं पहुंचने देते है। जंगली जीवन में उन्हें अभी अच्छे दिनों के आने को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है।करीम को पता है कि सरकार गरीबों के लिए मकान बना कर देती है,लेकिन वह गरीब भी उनकी नजर में मैदानी सुगम जीवन जीने वाले ही हैं।करीम को इस बात का पछतावा है कि एक बार उन्हें सरकार से जमीन का पट्टा और घर मिलने वाला था लेकिन उनके अब्बा मरहूम इससे वंचित रह गए।करीम की दिली इच्छा है कि उनके भी "अच्छे दिन" आएं और वह जंगली से सभ्य मानव जीवन में प्रवेश कर सके। उनको उम्मीद है कि मोदी की जितनी तारीफ उन्होंने सुनी है उसके हिसाब से उन्हें भी कुछ न कुछ अच्छे दिन देखने को मिलेंगे।
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प्रेमकुल मिशन ट्रस्ट वनगुर्जरों के उत्थान के लिए प्रयासरत है।आज मिशन टीम ने अपने वनगुर्जर बंधुओं का दर्द बांटने के लिए दौरा किया और मामूली सहायता भी प्रदान की।
भारत माता की जय: समस्या जड़ों में है..!
कुछ लोगों को ये भ्रम है कि भारत माता की जय बोलना देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता है।मैं यह मानता हूँ कि हम किसी से जबरिया कोई नारा नहीं लगवा सकते है और कदाचित मैं ऐसा करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं हूँ।क्योंकि यह वह नारा है जो हृदय की गहराइयों में जन्म लेता है और प्रस्फुटित होने के बाद आकाश को गुंजायमान कर देता है।असल में यह नारा सिर्फ दिखावट के लिए लगाना इतना भी आसान नहीं है, जितना कि कुछ लोगों को लगता है।यदि सिर्फ यह नारा लगाने मात्र से कोई देशभक्त हो जाता तो फांसी की सजा से अंतिम समय तक बचने के पुरजोर उपाय करने वाला अफज़ल यह नारा सबसे पहले और ऊँची आवाज से लगाता।उमर खालिद भी ऊँचे सुर में यह नारा बुलंद करता। देवबंदी फतवे में भारत माता की जय का नारे न लगाने के लिए जो तर्क दिया है, वह यह है कि "क्योंकि हम इस वतन को अपना खुदा नहीं मानते है। इसलिए भारत माता की जय नहीं बोल सकते है!" मेरा यहाँ यह सवाल है कि यदि सिर्फ जय बोलने मात्र से किसी संज्ञा को खुदा का दर्ज़ा मिल सकता है तो फिर हिन्द की जय ही कैसे बोली जा सकती है ?
यदि ओवैसी जैसों को भारत माता की जय बोलने से ही दिक्कत होती तो उनका यह तर्क होना चाहिए था कि "मैं भारत माता(देवी?) की जय नहीं बल्कि भारत की जय बोलूंगा, हिन्द की जय बोलूंगा।"
दरअसल भारत माता की जय में ओवैसी जैसों के लिए एक गहरा दर्द छुपा है और वह है-" जड़ों से जुड़ने का दर्द"..!
"भारत माता की जय" उदघोष असल में सांस्कृतिक है न कि राजनीतिक (अब यह बात अलग है कि ओवैसी ने इसका राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है )। यह वह नारा है जिसका भारतीय मुस्लिमों की पूर्ववर्ती पीढ़ियों ने किया है।इसलिए यह नारा निश्चित रूप से पिछली पीढ़ियों से वर्त्तमान पीढ़ी का सम्बन्ध स्थापित करता है। यही घृणित राजनीति करने वाले लोग नहीं चाहते है। यही वह नारा है जो देश के मुस्लिमों को सांस्कृतिक रूप से यहाँ के हिन्दू समाज के साथ समरस कर सकता है। जैसा कि इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे दक्षिण पूर्वी देशों में हुआ है।भारत माता की जय के उदघोष को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करना वोट बैंक की राजनीती की सैद्धांतिक तौर पर पुष्टि करता है।भारत में वोट बैंक की राजनीति का आवश्यक तत्व ही यह है कि समस्त भारतीय मुस्लिम समाज को हर हाल में सांस्कृतिक रूप से यहाँ के बहुसंख्यक हिन्दू समाज से काट कर रखा जाए।असल में जड़ों से जुड़ने का सुख हर किसी की किस्मत में नहीं होता है।दक्षिण अफ्रीका में सदियों पहले बस चुका "गिरमिटिया" समाज आज भी बहराइच जैसे पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलो एवम् शेष भारत में आपको भटकता मिल सकता है।मैंने खुद दक्षिण अफ़्रीकी प्रोफ़ेसर ब्रिज महाराज को ऐसे ही अपनी जड़े ढूंढते हुए देखा है।उ.प्र. सरकार ने भी जड़ से कटे ऐसे लोगों, जिनके पुरखे सैंकड़ो वर्ष पहले दक्षिण अफ्रीका, गिनी, फिजी, सूरीनाम आदि देशों में बस गए थे। लेकिन उनके वंशज खुद की जड़ों से कालान्तर में कट गए है, के लिए Discover your roots योजना चलाई थी। ताकि ऐसे लोगों को उनकी जड़ो से जोड़ने में प्रदेश सरकार मदद कर सके।
भारत की सांप्रदायिक समस्या की जड़ भी जड़ों में ही है।इसे समझने की जरूरत है। जहाँ जहाँ खून में राजनीति का नमक है,वहां वहां भारत माता की जय से कुछ लोगों को परेशानी है जैसे ओवैशी और देवबन्द । लेकिन जहाँ जहाँ खून में देश का नमक है वहां वहां भारत माता की जय से आकाश गूंजता है जैसे दिल्ली में सूफी सम्मेलन और सऊदी में भारतीय मुस्लिम महिलायें।।
भारतीय संविधान के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी कार्य,चाहे वह धार्मिक हो या सामजिक, करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। "भारत माता की जय" बोलने का मतलब यह नही है कि किसी सड़क चलते व्यक्ति को पकड़ कर मैं कहने लगू कि "बोल भारत माता की जय,नहीं तो तुम देशद्रोही हो!"
देश में कोई भी व्यक्ति या संस्था "देशभक्ति प्रमाणीकरण का प्राधिकरण नहीं है." ।
भारत का बहुसंख्यक समाज एवं कई अल्पसंख्यक समाज भी, "माताभूमिपुत्रोहमपृथ्वीयाः अर्थात भारतभूमि मेरी माता और मैं इसका पुत्र हूँ,में विश्वास रखकर भारत भूमि को मातृभूमि मानता है। वह सगर्व भारत माता की जय बोलता है।
भारत माता की जय बोलने का जब कोई अवसर आये तो न बोलने वाले उस समय चुप रह सकते है। उनके ऐसा करने से किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए।लेकिन ऐसे किसी अवसर पर भारत माता का उदघोष होने पर ,भारत माता की जय न बोलने का इच्छुक कोई आदमी चुप रहने के बजाय चिल्लाकर यह कहने लगे कि " मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा तो इसका अर्थ साफ है कि वह जानबूझकर "सगर्व भारत माता की जय बोलने वालों की भावनाओं को चोट पहुँचाना चाहता है।
ऐसा कहना न केवल बहुसंख्यक भावनाओं पर चोट है वरन "राष्ट्र की हमारी संकल्पना को भी चुनौती देने के समान है."।
ऐसे व्यक्ति की देशभावना पर सन्देह स्वाभाविक है।
क्या देश में कोई व्यक्ति या समाज ऐसा है जिसकी गर्दन पर किसी ने छूरी रखकर बोला हो कि "बोल भारत माता की जय" फिर "भारत माता की जय" पर अनावश्यक विवाद क्यों ?
शनिवार, 5 मार्च 2016
गांधी-नेहरू नहीं चाहते थे आज़ादी ?
सन् 1947 से पहले कई ऐसे अवसर आये जब आज़ादी भारत की दहलीज़ पर खड़ी थी लेकिन महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू दोनों ने "अनुकूल परिस्थितयों " के आने तक के लिए उस अवसर को आगे के लिए टाल दिया।
प्रथम विश्व युद्ध 1914 से 1918 तक चला जिसने ब्रिटिश भारत सरकार को आर्थिक रूप से काफी कमजोर बना दिया था, यही वह समय भी था जब भारत में आज़ादी के लिए होने वाले क्रन्तिकारी आंदोलन की धार भी काफी तेज हो चुकी थी।ब्रिटिश सरकार द्वारा परिस्थितियां लगातार नियंत्रण से बाहर होती जा रही थी।सरकार हताशा के दौर से गुजर रही थी।इसी हताशा का परिणाम सन् 1919 में जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के रूप में सामने आया,जिसकी दुनियाभर में आलोचना की गई।भारत जैसे संसाधन समृद्ध देश पर ब्रिटेन के कब्जे को ताकतवर होते अमरीका जैसे देश भी ईर्ष्या की दृष्टि से देख रहे थे और इसी कारण से वह भी ब्रिटेन से भारत की आज़ादी चाहते थे।
सन् 1919 से लेकर 1940 तक के बीच के काल में भारत में ब्रिटेन की उपस्थिति किसी के घर पर "टाइमपास गेस्ट" की भांति थी. किसी भी एक तगड़े झटके से ब्रिटिश सत्ता के तार तार होने की स्थिति थी।लेकिन महात्मा गांधी को जवाहर लाल नेहरू के सत्तासीन होने के अनुकूल परिस्थितयों का इंतज़ार था।इसलिए वह किसी न किसी बहाने आज़ादी को टालते रहे।क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आसमान पर गांधी 1919 के बाद "काले बादलों" की तरह छाये हुए थे।
सोमवार, 8 जून 2015
सुजान सिंह तंवर..
हथछोया, शामली जनपद,उत्तर प्रदेश की कैराना तहसील का एक ऐतिहासिक गाँव है जो ऊन विकास खन्ड के अंतर्गत आता है, इस गाँव में तंवर (तोमर) गौत्र के गुर्जरों की बाहुल्यता है। ऐतिहासिक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते है कि 1192 ई. के तराइन युद्ध में मुहम्मद गौरी से पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली के फतेहपुर बेरी आदि गांवों से बहुत से तंवर पलायन कर गए। इनमे से सुजान सिंह तंवर ने इस क्षेत्र में सुजान खेडी गाँव की स्थापना की जो राजस्व दस्तावेजों में आजकल हथछोया एवं सांपला तथा मुंडेट खादर के बीच एक गैर-आबाद गाँव के रूप में दर्ज है। बाद में कई कारणों से सुजान खेडी की आबादी हथछोया में प्रवास कर गई।
जारी.......
बुधवार, 3 जून 2015
लेखन की भूख-2
(16 अक्तूबर 2013)
सुशील उपाध्याय जी इस मायने में मेरे और डॉ. अजीत के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुए कि उनसे हमें कुछ समाचार पत्र/पत्रिकाओं के पते और शायद एकाध की प्रति भी प्राप्त हो गए जहाँ हम प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएं भेज सकते थे.सुशील जी से मैंने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह किया था कि पत्र/पत्रिकाओं में रचनाएं कैसे छपती हैं ? एक नवोदित लेखक के लिए यह जानना सबसे महत्वपूर्ण होता है कि उसकी रचनाएं कैसे महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाएं ? जब लेखन की खुमारी का कोई शिकार होता है तो उसका यह भी सपना होता है की उसकी रचनाओं का सम्मानजनक पारिश्रमिक भी उसे मिलने लगे.मेरी ख्वाहिश भी इससे कुछ जुदा नहीं थी. मैंने और डॉ. अजीत ने लेखन के उस प्रारंभिक दौर में लेखन विधियों,तौर तरीकों, और प्रकाशन बिन्दुओं से सम्बंधित बिन्दुओं पर मार्गदर्शक विहीन शौध भी खूब किया.सुशील जी से हमने कभी इस बात पर चर्चा नहीं की कि प्रभावी लेखन कैसे किया जाए, वरन हमारी जिज्ञासा यह होती थी कि कैसे छपा जाये ? वह भी श्रेष्ठ पत्रिकाओं आदि में ! सुशील जी से हमने जो सबसे महत्वपूर्ण बात लेखन के क्षेत्र में सीखी वह यह थी कि किसी पत्र-पत्रिका में कोई रचना प्रकाशनार्थ भेजने के लिए उसके साथ ' मौलिक एवं अप्रकाशित ' होने का प्रमाण-पत्र लगा होना जरुरी होता है.पहले तो हमने सोचा कि यह प्रमाण पत्र कहाँ से हासिल किया जाए लेकिन जब उन्होंने बताया की सादे कागज पर स्वयं ही लिख कर भेजना होता है कि प्रस्तुत रचना मेरी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना है, तो हमें काफी राहत महसूस हुई.
मैंने रचनाएं प्रकाशन हेतु भेजने के लिए शुरुआत सरिता, जाहनवी, अमर उजाला एवं दैनिक जागरण जैसे उच्चकोटि के प्रकाशन समूहों से की.सुशील जी से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी की रचना के साथ वापसी के लिए डाक टिकट लगा लिफाफा भी भेजना होता है..कुछ दिनों बाद ही संपादकों की बेदिली की गाज़ का मै शिकार होने लगा जब 'संपादक के खेद सहित मेरी रचनाएं सादर वापिस ' आने लगी.इस दौरान अजीत ने पत्र-लेखन सीखने पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा.पत्र लिखकर भेजने से पहले अजीत मुझे भी दिखाया करते थे ताकि मै अपनी विशेषज्ञता का पुट उसमे डाल सकूँ.रचना मेरी वापस आती थी होसले पस्त अजीत भाई के हो जाते थे.और उनको डगर कठिन दिखाई देने लगती थी.लेखन का भूत हम दोनों पर इसकदर सवार हो चूका था कि संपादक के नाम पत्र, कविताएं, लेख,कहानियां लिखने मात्र से हमारी लेखन क्षुधा समाप्त नहीं होती थी..बल्कि हमने अनेक पत्र-मित्र भी बना लिए थे. प्रतिदिन हम दसियों पत्र अपने मित्रों को लिखकर अपनी क्षुधा का शमन करने का प्रयास करते थे.
मेरी और अजीत की दोस्ती को परवान चढ़ाने में कक्षा 11 के दौरान मुझे हुए टाई फाइड बुखार ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.मै थानाभवन के लाजपत राय कालेज में पढ़ता था.बुखार के कारण लगभग एक महीना मै कालेज नहीं जा पाया, अक्सर अपने घर की दहलीज ( बरामदा ) में चारपाई पर रहता था.अजीत भी प्रतिदिन अपने स्कूल से घर वापस आते ही मेरे पास आ जाते थे.हम घंटों साथ रहते थे.अनेक विषयों पर अपनी समझ के अनुसार चर्चा करते थे.सुशील भाई भी हमारी चर्चा में रहते थे. अक्सर हम उन्हें इस बात के लिए दोष दे देते थे कि वह अपनी ज्ञान-गंगा की धारा जानबूझकर हमारी और नहीं करना चाहते हैं.यद्यपि हमने कभी उनसे यह नहीं कहा की वह हमें कुछ सीखाएं. हमने यह धारणा बना ली थी कि गाँव का होने के नाते उनको यह सोचना चाहिए कि हम भी उनकी ही तरह आगे बढ़ सके.लेकिन वह ऐसा नहीं सोचते है!
मैंने और अजीत ने अपनी समस्या का खुद समाधान करने और आगे बढ़ने पर शौध जारी रखा.
( जारी.. )
शुक्रवार, 29 मई 2015
मेरे बाबा जी.
मेरे बाबा फूल सिंह दिलावरे बेहद सहज,सरल,मेहनती और ईमानदार व्यक्तित्व के धनी थे. अपने पिता श्री मामराज सिंह के बड़े पुत्र थे मेरे बाबा जी। इनके छोटे भाई श्री मंगल सिंह दिलावरे थे। मैंने स्वयं मेहनत करके सफल होने का गुरु मन्त्र अपने बाबा जी से ही सीखा.जब से मैंने होश संभाला था अपने आस-पास बाबा जी का कठोर अनुशासन पाया। बाबा जी सिर्फ कक्षा 4 तक ही पढ़ पाए थे। बाबा जी के पिता यानी मेरे परदादा श्री मामराज सिंह की युवावस्था में ही आकस्मिक मृत्यु हो गई थी। घर में बड़े पुत्र होने के नाते परिवार का भार बाबा जी के कंधो पर आ गया था इसीलिए उन्होंने पढाई भी बीच में ही छोडनी पढ़ी । अपने छोटे भाई को उन्होंने 12 वीं पास कराई।
बाबा जी श्री मदभगवद गीता के नियमित पाठक और हनुमान के परमभक्त थे। अपने जीवनकाल में मैंने ऐसा कोई अवसर नहीं देखा जब बाबा जी के पास "गीता" को न पाया हो !
प्रारंभिक शिक्षा के दौरान मै अक्सर स्कूल के बाद खेत में चला जाता था । अक्सर पिताजी और बाबा जी का दोपहर का खाना लेकर। मेरी उम्र के ही मेरे परिवार के रविन्द्र (बीटू) , सुरेन्द्र, सतीश आदि कई मित्रों का प्रिय खेल था "कुआ डंडा".हम दोपहर में बाग में जाकर पेड़ पर चढ़कर यह खेल खेलते थे लेकिन बाबा जी मौका देखते ही दोपहर में मुझे पशु चराने के लिए उनके पीछे लगा देते थे और स्वयं आसपास किसी "खाल" (खेत सिचाई हेतु पानी की नाली) की खुदाई करके उसे साफ़ करने लग जाते थे। इसके पीछे शायद उनका मकसद रहता हो कि काम करते समय उन्हें बोरियत न हो और मै भी भैंस चराने में लगा रहूँ । "कुआ डंडा" खेल में पेड़ से गिरकर हाथ-पैर टूटने का जोखिम हमेशा बना रहता था। इस जोखिम को बाबा जी अच्छी प्रकार जानते थे इसलिए वे मुझे भैंस चराने के काम में लगा देते थे। भैंस चराने का काम काफी बोरियत भरा काम था। अक्सर मै झोटे या भैंस की कमर पर चढ़कर बैठ जाता था, यह यमराज मुद्रा होती थी। मेरी उम्र के ज्यादातर साथियों ने यमराज मुद्रा का खूब आनंद लिया हुआ है।
एक बार जब मै कक्षा 3-4 का विद्यार्थी था, मै अपने बाग में भैंस चरा रहा था। थोड़ी ही देर में मैंने देखा कि एक करीब 4-5 फुट लम्बा सांप मेरी और भैंसों की और बढ़ रहा है। मैंने पलभर में निष्कर्ष निकाल लिया कि यह सांप या तो मुझे काटेगा या मेरे पशुओं को! मेरे हाथ में एक बेहद पतली "कामची" (डंडी) थी। मैंने एक क्षण में फैसला कर लिया कि आज या तो यह सांप नहीं रहेगा या मै ! मैंने उस कामची से उस सांप पर जोर लगाकर प्रहार करना शुरू कर दिया। मै सांप पर वार करता गया और सहायता के लिए अपने बड़े भाई संजय सिंह (पटवारी) को जोर से आवाज देने लगा " ओ ! संजय भाई सांप, ओ ! संजय भाई सांप ! " जब तक संजय भाई लगभग 300 मीटर की दूरी चलकर मेरे पास सहायता के लिए आये, सांप अपनी अंतिम साँसे गिन रहा था। इस घटना की चर्चा पुरे मोहल्ले में हो गई। शाम को बाबाजी और पिताजी ने जब इस घटना कु चर्चा मेरी दादी "बोहती" के सामने की तो उन्होंने मेंरा नामकरण " दिलदार " कर दिया। वह जब तक जीवित रही मुझे इसी नाम से बुलाती रही।
मेरे बाबाजी ( दादाजी) हम दोनों भाइयो से बेहद प्यार करते थे। उन्हें प्रकृति से बेहद प्यार था । इसका सबसे बड़ा प्रमाण था हमारे खेत में नर्सरी होना। हमारी नर्सरी दूर दूर तक प्रसिद्द थी। बाबाजी हमेशा नर्सरी में कुछ न कुछ काम करते रहते थे। हमारे लाख समझाने पर भी वह कभी गाँव में रात में नही रुके। हमेशा रात्रि विश्राम खेत में ही करते थे ।
बाबाजी मोच,हड्डी खिसकाना या उतरना के इलाज के लिए दूर-दूर तक मसहूर थे। पंजाब, हरियाणा,आज का उत्तराखंड और दिल्ली तक के लोग उनसे इलाज करवाने के लिए आते थे.
जिस मरीज का इलाज बड़े बड़े डॉक्टर नहीं कर पाए उनको बाबा जी ने दुरुस्त किया। हाथ,पैर की हड्डी का उतरना,पैर में मोच आ जाना,कुल्हे की हड्डी का खिसक जाना, इन सभी के निष्णात चिकित्सक,मेरे बाबा जी ने अपनी सेवाएं बिना किसी मूल्य के लोगों को उपलब्ध कराई। कई बार लोग जब असाध्य पीड़ा से निज़ात पा जाते थे तो खुश होकर बाबा जी को धन भेंट करने की इच्छा जाहिर करते थे लेकिन बाबा जी बड़ी विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर यह कहकर मना कर देते थे कि जिस दिन मै अपनी सेवा की कीमत ले लूँगा उसी दिन मेरी यह विद्या बेअसर हो जाएगी।
मुझे हल्का सा एवं धुंधला सा याद है कि हमारे खेत में बाबा जी ने केन क्रेशर लगाया था, बाबा जी बताते थे कि गुड-शक्कर एवं खांड बेचने के लिए वह शामली बाजार जाते थे। एक बार गुड से भरी हुई बुग्गी पलट गई तो उसमे बैठा हुआ हमारा नौकर और बाबा जी दोनों बुग्गी के नीचे दब गए थे। आस-पास के लोगों ने बुग्गी सीधी करके दोनों को बाहर निकाला। तब तक नौकर की मौत हो चुकी थी और पहिये के नीचे बाबा जी की गर्दन दबने के बावजूद बाबा जी जीवित बच गए। बाबा जी की गर्दन टेडी हो गई थी, जिसका उन्होंने स्वयं इलाज किया और गर्दन कुछ दिनों में खुद ही सीधी कर ली। बाद के दिनों तक भी खाना खाते, हुक्का पीते समय उनकी गर्दन हिलती रहती थी। बाबा जी की एक खूबी यह थी कि उन्होंने कभी न तो दिन में हुक्का नही पिया और न ही गाँव में किसी के घेर या बैठक पर जाकर ही हुक्का गुडगुडाया। रात को खुद हुक्का ताजा करके वह देर रात तक हुक्का पीते थे। कभी रात्रि में उन्होंने भोजन भी नही किया, रात को वह दूध जरुर पीते थे.